विंध्येलखण्ड से बन गया बुन्देलखण्ड
आज का बुंदेलखण्ड अपने अंक में अपना बहुत ही गौरवपूर्ण इतिहास समाविष्ट किये हुए हैं। विध्यांचल पर्वत की शाखाओं से घिरा होने के कारण कभी इसका नाम विंध्येलखण्ड था, जिसका अपभ्रंश होकर बुन्देलखण्ड हो गया। रामायण काल में इस क्षेत्र में उस समय में 'दण्डकारण्य' नामक प्रांत का भी कुछ भाग आता था। भगवान श्रीराम कभी इस क्षेत्र से ही निकलकर किष्किंधा की ओर गये थे।
आभीर से बन गया अहीरवाड़ा
महाभारत में चैदि और दशार्ण नामक प्रांतों का उल्लेख आता है, चैदि की स्थिति बुन्देलखण्ड के पूर्व में तथा दशार्ण की पश्चिमी भाग में मानी गयी है। दशार्ण आभीर लोगों की कर्मस्थली थी। गोरेलाल तिवारी ने अपनी पुस्तक बुंदेलखण्ड का संक्षिप्त इतिहास में लिखा है-''झांसी और ग्वालियर के बीच आभीर लोग रहते थे। इन्हें भी समुद्र गुप्त ने अपने अधिकार में कर लिया था। इसी भाग को आजकल अहीरवाड़ा कहते हैं।''
हर्ष के शासनकाल में इस क्षेत्र को ह्वेनसांग ने झुजौति के नाम से वर्णित किया है। इस प्रकार विभिन्न उतार चढ़ावों से निकलने वाली बुन्देलखण्ड की वीरभूमि ने कई राजवंशों के शासन काल देखे हैं। इसने अपने वैभव और पराभव दोनों को निकटता से देखा भी है और झेला भी है। हर्ष के पश्चात यहां 'गुर्जर परिहार वंश' का भी शासन रहा। राजा यशोवम्र्मन देव ने गौड, खस, कौशल, काश्मीर, कन्नौज, मालवा, चेदि कुरू, गुर्जर (गुजरात) आदि प्रांतों पर विजय प्राप्त की थी।
यशोवम्र्मन देव के पश्चात आल्हा और ऊदल ने इस देश की गौरवमयी परंपरा का अपने काल में नेतृत्व किया। इस प्रकार इस क्षेत्र का एक गौरवपूर्ण इतिहास है। वीर शासक कीत्र्तिसिंह चंदेल और दुर्गावती का बचपन
इसी क्षेत्र में स्थित कालिंजर का इतिहास में विशिष्ट स्थान है। यहां का शासक कीत्र्तिसिंह चंदेल था। 1524 ई. में दुर्गाष्टमी के दिन उनके यहां एक पुत्री ने जन्म लिया। जिसका नाम उन्होंने दुर्गावती रखा।
यह ऐसा काल था जब आक्रांता सुल्तानों के वंशजों का सूर्य भारत में अस्ताचल की ओर जा रहा था और 'दुर्गावती' जब बचपन में चलना सीख रही थी तो उसी समय बाबर भी यहां सल्तनत के खण्डहरों पर खड़े किये गये अपने साम्राज्य को 'पैंया-पैंया' चलना सिखाने का प्रयास कर रहा था। जब दुर्गावती थोड़ी और बड़ी हुई तो बाबर का साम्राज्य भी खण्डहर हो गया और उसके ध्वंसावशेषों पर शेरशाह सूरी ने अपना साम्राज्य स्थापित कर अपनी विजय-पताका फहराकर कुछ काल के लिए अपने सूरवंश का भव्य-भवन बना दिया। पर यह खेल भी अधिक समय तक नही चला उसका भव्य-भवन भी भारत के देशभक्तों के प्रतिरोध और प्रतिशोध के कारण शीघ्र ही भरभराकर गिर गया। तत्पश्चात देश में पुन: मुगल सक्रियता से हावी हो गये।
जब बादशाह अकबर अल्पावस्था में शासक बनाया गया तो उस समय दुर्गावती 32 वर्ष की हो चुकी थी।
दुर्गावती से बन गयी एक वीरांगना रानी
दुर्गा अपने नाम के अनुरूप ही दिव्य गुणों और दिव्य तेज से सुभूषित थी। बचपन से निकल कर उसने जैसे ही किशोरावस्था में पग रखा तो उसके शौर्य तेज और वीरता ने अपना रंग दिखाना आरंभ किया। जब वह यौवनास्था में प्रविष्ट हुई तो उसके क्षत्रियोचित गुणों की सुगंध दूर-दूर तक फैलने लगी। उसका विवाह गढ़मंडल (गोंडवाना) के शासक संग्राम शाह के युवा पुत्र दलपतशाह से हुआ।
अब दुर्गावती रानी हो गयी थी। उसमें गंभीरता, वीरता, धैर्य और साहस तो पहले से ही कूट-कूटकर भरे थे पर अब उसने अपने आपको नई भूमिका में देखकर अपने भीतर इन गुणों का और भी अधिक विस्तार किया। पुनश्च रानी को पता नही था कि नियति उसे किस बड़ी भूमिका के लिए गोण्डवाना की रानी बनाकर ले आयी है? अभी तो उसने वैसा ही सोचा था जैसा हर युवती अपने विवाहोपरांत सोचा करती है, अपनी प्यारी सी घर गृहस्थी हो उसमें ऐश्वर्य के सभी साधन हों...इत्यादि।
पुत्र नारायण का जन्म
विवाह के एक वर्ष पश्चात रानी को एक पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम रानी के ससुर संग्रामशाह ने नारायण रखा। नारायण को रानी ने वे सारी सुविधाएं देकर पालना आरंभ कर दिया जो एक राजकुमार के लिए आवश्यक और अपेक्षित हुआ करती हैं। नारायण का लालन-पालन सर्वसुविधाओं के मध्य हो रहा था और होता भी क्यों नही? क्योंकि वह अपने दादा के राज्य का भविष्य का उत्तराधिकारी था।
पति दलपतशाह का देहांत
दुर्भाग्यवश जब नारायण मात्र तीन वर्ष का ही था तो उसके पिता दलपतशाह का देहांत हो गया। रानी के लिए यह घटना वज्रपात से कम नही थी, परंतु उसने अपने आपको संभाला और स्वयं को भीतर से टूटने नही दिया। उसने अपनी भावी भूमिका का बड़े शांत मन से अध्ययन किया और यह विचार कर लिया कि यदि वह टूट गयी तो गढ़मण्डल का राज्य भी समाप्त हो जाएगा और शत्रु उसे और उसके वंश के लोगों को भी समाप्त कर देगा। उसने अपने जीवन के प्रश्न की जटिलता को समझा जिसमें जर, जमीन और जन तीनों के लिए संकट उत्पन्न होने जा रहा था। इसलिए रानी ने इन तीनों की सुरक्षार्थ अपने जीवन को जुआ के दांव पर लगा दिया, जिससे कि प्रश्न की जटिलता का समाधान खोजा जा सके। उसने अपने पुत्र नारायण (जिसे वीरनारायण भी कहा जाता था) की शिक्षा-दीक्षा का पूर्ण प्रबंध किया और शासन की बागडोर अपने हाथों में लेकर राजकाज चलाने लगी।
अकबर की कोपदृष्टि
जब रानी के छोटे से राज्य की कहानी अकबर को ज्ञात हुई कि इस राज्य पर शासन करने वाली एक नारी है, तो वह हंसा और उस राज्य को अपने साम्राज्य में मिलाने का मोह संवरण नही कर सका। उसने गढ़मंडल के रूप में थाली में रखे भोजन को देखा तो उसके मुंह में पानी आ गया। अत: उसने इस राज्य को अपने साम्राज्य में मिलाने की तैयारी आरंभ कर दी। उधर रानी अभी तक अकबर के उद्देश्यों और आशयों से पूर्णत: अनभिज्ञ थी। उसे नही पता था कि शत्रु क्या करने वाला है, और उसकी योजना क्या है? पर जैसे ही रानी को ज्ञात हुआ कि अकबर उसके राज्य पर हमला करने के लिए चढ़ा चला आ रहा है, तो वह सिंहनी की भांति अपने शत्रु की पदचापों की प्रतीक्षा करने लगी कि जैसे ही शत्रु की पदचाप सुनाई देगी, वैसे ही उसका अंत कर दिया जाए।
रानी हो गयी युद्घ के लिए तत्पर
रानी अपने वंश के इतिहास से परिचित थी, वह जानती थी कि एक मुगल के समक्ष शीश झुकाने का अर्थ होगा संपूर्ण हिंदू जाति को लज्जित कर देना। इसलिए रानी ने मन बना लिया था कि परिणाम चाहे जो हो पर स्वतंत्रता से कोई समझौता नही किया जा सकता। मुगलों के सामने नतमस्तक होने से तो 'वीरगति' प्राप्त करना उचित होगा। उसे अपने ससुर संग्रामशाह की अनेकों वीरतापूर्ण कहानियों का बोध था कि वे कितने प्रतापी और स्वाभिमानी शासक थे? अत: रानी नेे निर्णय ले लिया कि शत्रु के सामने शीश न झुकाकर उसका सामना किये जाने में ही भलाई है। इसी से कुल मर्यादा की रक्षा होना भी संभव है। रानी ने अपने संक्षिप्त शासन काल में ही कुंए, बावड़ी, मठ, मंदिर आदि बनवाकर जनहित के कई कार्य करते हुए अपनी प्रजा का मन जीत लिया था। उसकी अपनी एक प्रिय दासी थी जिसका नाम रामचेरी था, जिसे वह बहुत स्नेह करती थी, उसके नाम पर रानी ने चेरिताल तथा अपने नाम पर रानीताल बनवाया। इसी प्रकार एक तीसरा ताल उसने आधारताल के नाम से अपने विश्वस्त दीवान आधारसिंह के नाम पर बनवाया था।
अकबर ने युद्घ का आधार तैयार किया
अकबर ने अपनी साम्राज्यवादी नीतियों का परिचय देते हुए रानी दुर्गावती के राज्य को अपने साम्राज्य में मिलाने के उद्देश्य से रानी के समक्ष प्रस्ताव रखा कि यदि वह युद्घ से बचना चाहती है तो अपने सफेद हाथी (सरमन) और अपने विश्वासपात्र मंत्री आधारसिंह को यथाशीघ्र उसके दरबार में भेज दे। अकबर रानी को अपनी बेगम बनाना चाहता था। अत: उसने रानी के समक्ष ऐसी शर्त रखी थी कि जिसे रानी मानती ही नही और उसके न मानने पर अकबर को उसके राज्य पर आक्रमण करने का बहाना मिल जाना था।
आसफखां चला बनकर हमलावर
रानी के पास जब अकबर का यह प्रस्ताव पहुंचा तो रानी ने इसे तुरंत बड़ी निर्भीकता से अस्वीकार कर दिया। इससे अकबर स्वयं अत्यंत क्रोधित हो उठा, और उसने गोण्डवाना के लिए अपने एक विश्वसनीय आसफ खां को सेना लेकर भेजा। आसफ खां एक महिला को मिटाकर और उसे जीवित कैदकर उसे अपने बादशाह की सेवा में लाने के उद्देश्य से प्रेरित होकर एक आक्रांता के रूप में गोण्डवाना की ओर चल दिया।
रानी कूद पड़ी युद्घ की ज्वालाओं में
रानी को जब आसफ खां के आक्रमण की जानकारी मिली तो उस वीरांगना भारतीय क्षत्रिय परंपरा का अनुकरण करते हुए बड़ी वीरता से शत्रु का सामना किया। रानी ने इतनी प्रबलता से आक्रमण का प्रतिरोध किया कि शत्रु को प्राण बचाकर भागने पर विवश कर दिया। आसफ खां एक विलासी व्यक्ति था। वह सोच रहा था कि रानी एक अबला है और शीघ्र ही उसके नियंत्रण में आ जाएगी। आसफ खां की गिद्घ दृष्टि रानी के कोष पर थी, वह उसे लूटकर मालामाल होना चाहता था, और रानी को अपने स्वामी अकबर को सौंपकर उसकी प्रशंसा का पात्र बनना चाहता था। पर उसे अत्यंत लज्जित होना पड़ गया कि भारत माता की एक सच्ची सुपुत्री ने उसे पहले झटके में ही दिन में तारे दिखा दिये। उसके लिए रानी की इतनी वीरता अप्रत्याशित थी कि वह निराश भी था और हतप्रभ भी।
3000 मुगलों की ली आहुति
आसफ खां ने रानी से मिली पराजय का प्रतिशोध लेने के लिए पुन: गोण्डवाना पर आक्रमण कर दिया। इस बार उसने दुगुने वेग से हमला बोला था। दुर्गावती की सेना में इस बार बहुत कम सैनिक रह गये थे। रानी ने जबलपुर के पास नरई नाले के किनारे शत्रु का प्रतिरोध किया। रानी स्वयं अपनी सेना का संचालन पुरूष वेष में कर रही थी।
रानी ने और उसकी सेना ने अपनी स्वतंत्रता की रक्षार्थ आज मर मिटने की ठान ली थी। रानी की उपस्थिति से उसके सैनिकों में दुगुणा उत्साह उत्पन्न हो गया था। उन सबके लिए आज स्वतंत्रता की रक्षा ही आवश्यक नही हो गयी थी, उसके साथ ही साथ रानी की रक्षा भी अनिवार्य हो गयी थी। क्योंकि रानी को यदि आसफ खां पकडक़र ले जाने में सफल हो गया तो इससे भारत की अस्मिता ही लुट जाती। तब हमारे वी योद्घाओं के लिए बड़ी अपमानजनक स्थिति उत्पन्न हो जानी थी। अत: जितने भी हिंदू वीर रानी के साथ थे उन सबने अपनी वीरता का परिचय युद्घ के आरंभ होते ही देना आरंभ कर दिया। उन सबने इस युद्घ को देश के सम्मान और नारी शक्ति के सम्मान के लिए लड़ा। भारत में अब तक के मुस्लिम सुल्तानों या बादशाहों के साथ भारत के योद्घाओं के जितने भी युद्घ हुए थे वे वास्तव में देश के सम्मान और नारीशक्ति के सम्मान के लिए ही लड़े गये थे। इस प्रकार नारीशक्ति के सम्मान के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करना भारत की वीर परंपरा है। इसे इतिहास में इसी प्रकार समझने की आवश्यकता है।
रानी स्वयं भी बिजली की भांति गरज रही थी, जिधर भी घुस जाती उधर ही शवों का ढेर लगा देती। शत्रु कटता, मिटता और सिमटता जा रहा था। हमारे हिंदू वीरों ने 3000 मुगल सैनिकों की बलि ले ली थी। 23 जून 1564 को हुए इस युद्घ में मुगल सेना की अपार क्षति हुई थी। आज शत्रु पुन: व्याकुल हो उठा था।
बनने लगीं विपरीत परिस्थितियां
अगले दिन 24 जून को युद्घ प्रारंभ हुआ। रानी ने अपने पुत्र वीरनारायण को इस दिन सुरक्षित स्थान पर भेज दिया। उस दिन रानी के लिए विपरीत परिस्थितियां बननी आरंभ हो गयी थीं। युद्घ में रानी बड़ी वीरता से लड़ रही थी। अचानक एक तीर उसकी एक भुजा में आ घुसा। रानी तनिक भी विचलित नही हुई और उसने वह तीर शीघ्र ही निकाल कर फेंक दिया। परंतु तीर के लगने और तीर निकालने में जितनी देरी हुई उसका लाभ शत्रु पक्ष ने उठाया, और इससे पूर्व कि रानी संभल पाती, इतने में ही एक और तीर उसकी आंख में आ लगा। रानी ने बड़ी वीरता और धैर्य का परिचय देते हुए उसे भी निकाल दिया, पर कहा जाता है कि उस तीर की नोंक आंख में ही धंसी रह गयी। रानी अभी इस नये आघात से संभल भी नही पायी थी कि इतने में ही एक तीसरा तीर उसकी गर्दन में आ लगा।
आधारसिंह से कहा-'मेरी गर्दन काट दो'
अब रानी समझ गयी कि उसका अंतिम समय आ गया है। वह वीर प्रस्विनी थी और स्वयं वीरांगना थी, वीरों की नायिका थी और आज वीर वेष में ही युद्घ क्षेत्र में खड़ी भारतीय धर्म और संस्कृति की रक्षार्थ युद्घ का संचालन कर रही थी, उसे यह भली प्रकार ज्ञात था कि यदि उसे आसफ खां कैद करके बादशाह के पास ले गया तो क्या होगा? अत: उस वीरांगना ने उन अत्यंत पीड़ादायी क्षणों में भी अपना धैर्य नही खोया और ना ही शत्रु पक्ष के समक्ष किसी प्रकार की संधि का प्रस्ताव रखा। संधि तो वैसे भी उस वीरांगना के शब्दकोश में कहीं थी ही नही। अत: उसने अपने विश्वसनीय मंत्री आधारसिंह से उस समय आग्रह किया कि वह शीघ्रता से अपनी तलवार से उसकी गर्दन काट दे। रानी नही चाहती थी कि शरीर किसी शत्रु की तलवार से निढ़ाल होकर धरती पर गिरे। आधारसिंह के लिए रानी का आग्रह स्वीकार करना बडा कठिन था, वह इसके लिए धर्म संकट में फंस गया। रानी के लिए वे क्षण अत्यंत असहनीय होते जा रहे थे।
अपनी कटार से ही कर लिया आत्मबलिदान
जितने क्षण व्यतीत हो रहे थे उतने व्यर्थ ही थे, इसलिए रानी ने आधारसिंह की मन:स्थिति को समझकर स्वयं ही निर्णय ले लिया। रानी ने अपनी कटार निकाली और उसे अपने सीने में भोंककर स्वयं ही बलिदान दे दिया। रानी की अवस्था इस समय लगभग 40 वर्ष थी। उसका शरीर मां भारती की गोद में आ पड़ा था, उसने गिरकर भी मां को नमन किया और मां ने अपनी सच्ची सुपुत्री को अपने हाथों से अपना आंचल थमा दिया। रानी का बलिदान हो गया पर उसकी वीरता की ऐसी कीर्ति हुई कि आज तक भी हर हिंदू को उसके बलिदान पर गर्व है। ऐसे ही बलिदानियों के लिए किसी कवि ने क्या सुंदर कहा है :-
लेखनी न लिखने को राजी
भावों का ज्वार विरुद्ध रहे
तो भी यह करुण कथा मुझको
लिखनी भी है गानी भी है ।
क्यों कोई और भला लिखता
हम खुद जब बेपरवाह रहे,
अपने वीरों के ये किस्से
हमने कब कितने लिखे कहे।
एकैक वीर की शौर्य कथा
सौ गाथाओं पर भारी है,
उनको सुनना पढना लिखना
हम सब की जिम्मेदारी है ।
अब भी हम अगर नहीं चेते
भावी पीढ़ी धिक्कारेगी,
यह कंजूसी लापरवाही
जीते जी हमको मारेगी ।
अपने पुरखों के जयकारों
गुणगानों से आकाश भरो,
उनकी अनुपम गाथाओं से
भूगोल भरो इतिहास भरो ।
कह दिया था नही जाऊंगी युद्घभूमि छोडक़र
रानी जिस समय आसफ खां से युद्घ कर रही थी तो उसके साथ केवल 300 सैनिक ही थे। उन तीन सौ वीरों ने 3000 मुगलों को काट दिया था। यह भी तो इतिहास का एक समुज्ज्वल पक्ष है कि एक हिंदू ने दस शत्रुओं का अंत किया। हम जो गाते हैं कि-'दस-दस को एक ने मारा फिर सो गये होश गंवा के' यह वाक्य रानी के वीरों ने इस युद्घ में सार्थक कर दिया था। रानी का पुत्र वीरनारायण युद्घ में बुरी तरह घायल हो गया था, तो रानी ने उसे सुरक्षित स्थान पर भिजवाने की व्यवस्था करा दी परंतु स्वयं युद्घ करती रही। उसके सैनिकों में से कई ने उसे स्वयं को भी युद्घ से हट जाने का आग्रह किया। परंतु रानी नही चाहती थी कि कल को इतिहास उनके लिए यह कहे कि माता-पुत्र दोनों ही अपने प्राण बचाकर युद्घ क्षेत्र से दूर चले गये थे। यह भारतीय इतिहास की परंपरा है कि जब युद्घ क्षेत्र से हटना उचित माना गया तो अच्छे-2 राजा युद्घ से हट गये पर जब देखा कि अब युद्घ से हटने का अर्थ होगा कायरता तो उस समय युद्घ क्षेत्र में डटे रहकर बलिदान देना भी उचित माना गया।
रानी के लिए ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हो गयी थी, इसलिए उसने अपने सैनिकों के आग्रह को अस्वीकार कर युद्घ क्षेत्र में डटे रहकर वहीं अपना बलिदान देना ही उचित माना। उसने कह दिया कि-'मैं युद्घ में आज विजयश्री अथवा मृत्यु में से किसी एक को लेने के लिए आयी हूं, इसलिए आज मेरे पीछे हटने का कोई प्रश्न ही नही है।'
बाजबहादुर को भी हराया था रानी ने
रानी दुर्गावती के पति दलपतशाह की मृत्यु लगभग 1550 ई. में हो गयी थी। उस समय सूर शासकों का वर्चस्व भारत में ढीला पडऩे लगा था। उस समय उसके लडक़े वीरनारायण की अवस्था छोटी थी, इसलिए अपने पति के राज्य की बागडोर रानी ने स्वयं संभाल ली। इसके पश्चात रानी ने लगभग 15 वर्षों तक अपने राज्य पर सफलता पूर्वक शासन किया। उसके विश्वसनीय आधारसिंह और मनठाकुर नामक दो मंत्रियों ने उसे शासन कार्यों के सफल संचालन में अच्छा सहयोग प्रदान किया।
राजा दलपतसिंह के निधन के पश्चात जिन शत्रुओं ने रानी के राज्य पर गिद्घ-दृष्टि डाली उनमें मालवा का मांडलिक राजा बाजबहादुर भी सम्मिलित था। उसे भी लगा था कि रानी तो एक महिला है, अत: उसे तो यूं ही हराया जा सकता है। अत: वह भी रानी के राज्य को अपने राज्य में मिलाने की योजनाओं में व्यस्त रहने लगा था। वह इतना उत्साहित था कि गोण्डवाना को एक दिन में ही प्राप्त करने के सपने लेने लगा थ। उसने इसी सपने को साकार करने के लिए रानी के राज्य पर अचानक आक्रमण कर दिया।
रानी भी उस समय की परिस्थितियों से परिचित थी। उसे ज्ञात था कि पति के न रहने से कितने लोगों के मुंह में पानी आ रहा होगा और कितने लोग दिन में सपने देख रहे होंगे कि रानी के रहते गोण्डवाना की शक्ति क्षीण हो चुकी है। फलस्वरूप अब तो यह बड़ी सफलता से छीना जा सकता है।
रानी ने दिखाई अपूर्व बहादुरी
रानी की अपनी सेना में 20,000 झुड़सवार तथा एक हजार हाथीदल के साथ-साथ बड़ी संख्या में पैदल सेना भी थी। अत: रानी ने बाजबहादुर के आक्रमण का बड़ी बहादुरी से सामना किया और उसे यह बता दिया कि बहादुर कहाने से बाज रह, यहां 'दुर्गा की अवतार' से उसका पाला पड़ा है और दुर्गा की शक्ति को वह पराजित नही कर सकता। रानी ने बाजबहादुर को निर्णायक रूप से पराजित किया। रानी के संगठन चातुर्य और सैन्य-संचालन की कीर्ति बाजबहादुर के हारते ही दूर दूर तक फैल गयी। इससे अकबर को बड़ी ईष्र्या हुई। उसने रानी की वास्तविक शक्ति का पता लगाने तथा उसे अपने नियंत्रण में लेने की संभावनाओं की जानकारी लेने के उद्देश्य से अपनी राज्यसभा के दो विद्वानों को अर्थात महापात्र तथा नरहरिमहापात्र को रानी की राजयसभा में भेज दिया। रानी ने भी अकबर के इन दोनों विद्वानों को अपने दरबार में यथोचित स्वागत सत्कार से सम्मानित किया। अकबर ने प्रारंभ में वीर नारायणसिंह को राज्य का स्वामी मान लिया था। परंतु उसका यह छद्मी स्वरूप शीघ्र ही मिट गया और उसने रानी को उसके पुत्र को रास्ते से हटाकर उनके राज्य को अपने साम्राज्य में मिलाने की कुत्सित योजना पर कार्य करना आरंभ कर दिया।
नारीशक्ति की प्रतीक थी दुर्गावती
वास्तव में रानी दुर्गावती का जीवन हमें यह बताने के लिए पर्याप्त है कि यहां बलिदान देने के समय पुरूष समाज ही आगे नही आया, अपितु समय आने पर वीरांगनाओं ने भी अपने कत्र्तव्य का निर्वाह करने में देर नही लगायी। हमें अपनी ऐसी वीरांगनाओं पर हृदय से गर्व है। क्योंकि इन वीरांगनाओं के कारण ही हमारा इतिहास गौरव गाथाओं का संगम बना। रानी की गौरवगाथा पर भारतीय इतिहास को गर्व है, और हम उस इतिहास के पाठक हैं। ऐसे पाठक जो उस गौरवगाथा की ज्योति को आगे लेकर चलना अपना पुनीत दायित्व समझते हैं।
क्रमश:
(लेखक की इस लेखमाला के कुल 6 खण्ड 'भारत के 1235 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास' नाम से प्रकाशित किये जाने हैं, जिनमें से प्रथम तीन खण्ड डायमण्ड पॉकेट बुक्स (प्रा.) लि. एक्स-30, ओखला इंडस्ट्रियल एरिया, फेज द्वितीय, नई दिल्ली-110020, फोन नं. 011-40712100, से प्रकाशित किये जा चुके हैं। खरीदने के इच्छुक पाठक उक्त पते से ये पुस्तकें प्राप्त कर सकते हैं। -साहित्य संपादक)
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