शिक्षा माफियाओं का हाल

shiksha mafia
हमारा राजनैतिक नेतृत्व आराम की नींद सो रहा है। राष्ट्र के भीतर ही राष्ट्र के सम्मान से खिलवाड़ करने वाले राष्ट्र को नोंच-नोंचकर खा रहे हैं, आज इन गिद्घों से राष्ट्र लहूलुहान है। ऐसे गिद्घ हर क्षेत्र में आपको देखने को मिल जाएंगे।
शिक्षा का वह क्षेत्र जो राष्ट्र के भविष्य को सुधारने और संवारने वाले अध्यापकों के हाथों में सुरक्षित रहा है, आज वह क्षेत्र भी इस प्रकार के गिद्घों से अछूता नही है। देखें वहां क्या हो रहा है :-
-वहाँ सरकारी स्कूलों में अध्यापक सो रहे हैं। कुर्सियों पर बैठे-बैठे ऊंघ रहे हैं।
-ट्यूशन की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। संस्कृति पर आधारित महत्वपूर्ण प्रश्नों को बताने और पढ़ाने की प्रवृत्ति घटती जा रही है।
-ज्ञानवर्धन अब लक्ष्य नही, विद्यादान अब कोई मिशन नही।
-नौकरी पाकर मटरगस्ती करना लोगों का अब विशेषाधिकार बन गया है। बहुत कम लोग विद्यादान को एक मिशन के रूप में लेकर इस क्षेत्र में आ रहे हैं।
-अर्थयुग में शिक्षा का भी व्यवसायीकरण हो गया है।
-नकल कराना और इसके लिए छात्रों से मनमाने पैसे लेना कुछ लोगों का धंधा बन गया है।
-जो लोग इस धंधे में लिप्त हैं, उनका एक बड़ा भारी सशक्त और व्यापक ‘नेटवर्क’ है इसमें नीचे से ऊपर तक जितने भी कर्मचारी और अधिकारी इस कार्य में लगे हुए हैं उन सभी का अंश उनके पद के अनुसार उनके पास बड़े ही साफ ढंग से पहुंच जाता है। इस नकल के द्वारा अयोग्य छात्र बड़े अच्छे अंक लेकर उत्तीर्ण हो जाते हैं।

राष्ट्र का भविष्य जिन हाथों से संवरना था वही हाथ आज इस राष्ट्रघात के घृणास्पद प्रयास में लगे हुए हैं। ये कैसे अध्यापक, कैसे शिक्षक और कैसे आचार्य हैं, संभवत: इन्हें अध्यापक शिक्षक और आचार्य के पावन शब्दों के अर्थ तक भी ज्ञात न हों।
एक आचार्य वशिष्ठ थे जिन्होंने राम को बनाया था। एक आचार्य द्रोण थे-जिन्होंने युधिष्ठिर का निर्माण किया था। एक आचार्य संदीपन थे जिन्होंने इस राष्ट्र को कृष्ण जैसा नीतिज्ञ शिष्य प्रदान किया था। एक आचार्य चाणक्य थे जिन्होंने अपने शिष्य चंद्रगुप्त मौर्य से नंदवंश को समूल नष्ट करा दिया था। एक आचार्य विरजानंद थे जिन्होंने अपने शिष्य स्वामी दयानंद सरस्वती को वेद विद्या की पुनप्र्रतिष्ठा के लिए समरांगण में कूद पडऩे और राष्ट्र की सेवा करने हेतु प्रेरित किया था।
परंतु आज क्या हो रहा है? आज आचार्य और शिक्षा के इस पवित्र कार्य में लगे लोग राष्ट्र के भविष्य से ही खिलवाड़ कर रहे हैं। कैसे बचेगा आचार्यों का यह देश? कैसे रक्षा होगी इसके नैतिक मूल्यों की? राष्ट्र के भाग्य के साथ जो लोग यह घिनौना खेल, खेल रहे हैं जो राष्ट्र के वर्तमान पर कालिख पोतकर उसे कुरूपित कर रहे हैं, उन घपलेबाजों और माया के जाल में फंसे लोगों के कार्यों से राष्ट्र की आत्मा दुखी है।
हमारे शिक्षक यह न सोचें कि उन्हें ‘शिक्षक दिवस’ पर सम्मानित नही किया गया। हो सकता है कि तिकड़मबाज और ऊंची पहुंच वाले धूर्त लोग इस क्षेत्र में आगे निकल गये हों। शिक्षकों को सम्मान सदैव अपने शिष्य के सुंदर व्यक्तित्व और कृतित्व से मिला करता है। यदि ऐसा न होता तो आज गुरू वशिष्ठ जी से लेकर गुरू विरजानंद जी का नाम हमारी जिह़्वा पर न होता। तिकड़मबाज अपने लिए पुरस्कार की युक्तियां खोजते हैं तो खोजते रहें परंतु शिक्षक शिष्यों का निर्माण करते रहें। राष्ट्र को वह राम दें, कृष्ण दें, युधिष्ठिर दें, दयानंद दें, इससे राष्ट्र का कल्याण हो जाएगा। उन शिक्षकों के लिए यही सबसे बड़ा पुरस्कार होगा।
राष्ट्र के हाथों पुरस्कृत होने वाला शिक्षक ‘महामहिम राष्ट्रपति जी’ के हाथों पुरस्कृत होने वाले शिक्षक से भी कहीं अधिक उत्कृष्ट होते हैं तथा प्रशंसनीय और पूजनीय होते हैं। इसलिए इस ओर ध्यान दिया जाए। इतिहास के पन्ने हमारे इस मत की स्वयं पुष्टि कर रहे हैं।
सरकारी उपेक्षा
सरकार ने नि:शुल्क शिक्षा देने की ओर कागजों में ही ध्यान दिया है, व्यवहार में वह लोगों को इस ओर आकृष्ट नही कर पायी। यह ठीक है कि निरक्षरता को समाप्त करने में राष्ट्र ने बड़ी भारी सीमा तक सफलता प्राप्त की है। किंतु साक्षरता अभियान समस्या का समाधान नही है।
वह पढ़ाई-लिखाई कोई पढ़ाई लिखाई नही मानी जा सकती जो व्यक्ति को संस्कारित न कर सके। साक्षरता अभियान और शिक्षित करने की सरकारी नीति के अंतर्गत आज जो वर्ग उभरकर सामने आये हैं उनमें अशिक्षित, साक्षर और शिक्षित ये तीन वर्ग सम्मिलित हैं। दुर्भाग्य से ये  तीनों ही राष्ट्र के लिए आज एक समस्या बने हुए हैं।
-अशिक्षित लोग तो इसलिए समस्या हैं कि वे अशिक्षित हैं, अज्ञान के अंधकार में भटक रहे हैं।
-साक्षर इसलिए समस्या हैं कि वे न तो अशिक्षित हैं और न ही शिक्षित हैं। शिक्षित व्यक्ति शिक्षित होकर चालाक, धूत्र्त और दूसरे के अधिकार को छीनकर उसके भाग्य की रोटी को खाने का अभ्यस्त हो गया है।
अब बतायें जो शिक्षा पढ़ा लिखाकर मानव को दानव बना दे, उसके भीतर के मानव को ही मार दे, उसे कैसी शिक्षा माना जाए? कथित शिक्षित वर्ग फल-फूलकर भारत के शेष समाज का दोहन और शोषण कर रहा है। पढ़ लिखकर व्यक्ति समाज के छोटे और अपने से निम्नवर्ग के लोगों के काम आने और उनके दुखों में हाथ बंटाने में अपमान मान रहा है। सब अपने से बड़े को उपकृत करना चाहते हैं।
जो कब्ज से पहले ही व्याकुल है उसी को और अन्न और भोजन दिया जा रहा है। यह है आज की शिक्षा प्रणाली का घृणास्पद स्वरूप। छोटे की ओर किसी का ध्यान नही है। फलस्वरूप वह वर्ग जो सबसे ऊपर बैठा हुआ है, और जिसे सब उपकृत करना चाहते हैं, निजी संबंधों के प्रति सर्वदा हृदयहीन और नीरस हो चुका है। पैसों में डूबकर प्यार को गंवा बैठा है। भोग और विलास उनके जीवन का मुख्य अंग बन चुका है। शरीर पोषण के धंधे, कालगर्लों के साथ मौजमस्ती, क्लबों में दूसरों की पत्नियों के साथ डांस और वह सब कुछ…जिसे लेखनी लिखने में असमर्थ है, ये उनके जीवन के मुख्य अंग बन गये हैं। 

(लेखक की पुस्तक ‘भारत में भयानक राजनीतिक षडयंत्र : दोषी कौऩ?’ से)
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