हमारा राष्ट्रीय संकल्प
''एक सनकी व्यक्ति समुद्र में नाव खेता हुआ जा रहा था। उसने अपनी नाव का प्रवाह कम किया और एक मूल्यवान मोती समुद्र में फेंककर धरती पर लौट आया। बाहर आने पर उसने एक बाल्टी ली और समुद्र के पानी को गड्ढा बनाकर उसमें उड़ेलने लगा। वह तीन दिन तक निरंतर यही कार्य करता रहा। तब अचानक समुद्र से एक प्रेत निकला और उससे पूछने लगा कि यह क्या करते जाते हो? तब उस सनकी व्यक्ति ने उत्तर दिया कि मेरा मोती समुद्र में कहीं खो गया है, उसे ढूंढऩे के लिए सुद्र खाली कर रहा हूं। इस पर प्रेत को हंसी आयी और वह कहने लगा कि समुद्र खाली कब तक करोगे?
तब उस व्यक्ति ने कहा कि जब तक समुद्र सूख नही जाता है, तब तक मेरा यह क्रम अनवरत जारी रहेगा। उस व्यक्ति की यह बात सुनकर प्रेत डर गया। वह शीघ्रता से समुद्र में गया और ढेर सारे मोती लाकर उस व्यक्ति को देकर बोला कि अब बस करो, और अपने घर के लिए चले जाओ।''
हमारे देश के वीर योद्घाओं का संकल्प भी कुछ ऐसा ही था-वह भारत रूपी समुद्र से विदेशियों को चुन-चुनकर बाहर फेंकने के लिए घोर परिश्रम कर रहे थे।
महाराणा का संकल्प....
संकल्पित व्यक्तियों के सामने दैवीय शक्तियां इसी प्रकार नतमस्तक हेाती हैं, जैसे समुद्र को सुखाने की हठ कर बैठे उपरोक्त व्यक्ति के समक्ष प्रेत नतमस्तक हो गया था। कहानी नि:संदेह काल्पनिक हो सकती है, पर हमारे राष्ट्रीय वीर योद्घाओं के संकल्प को अभिव्यक्ति देने के लिए पर्याप्त है। यदि हमारे वीर योद्घाओं का संकल्प ऐसा नही होता तो महाराणा प्रताप का नाम आज कोई नही जानता। वह अरावली पर्वत पर झोंपड़ी में बैठकर वहीं से अकबर के समुद्र रूपी साम्राज्य को समाप्त करने की योजनाएं बनाते रहे और समय ने कभी स्वयं ने तो कभी अकबर ने उनके सामने कई प्रकार के प्रलोभनों के मोती ला लाकर डाले पर महाराणा अपने राष्ट्रधर्म से तनिक भी विचलित नही हुए, उन्हें एक ही हठ थी कि समुद्र से अकबर रूपी जल को बाहर फेंक कर ही सुख की सांस लूंगा।
दो घुड़सवारों ने किया पीछा
भारत के स्वाभिमान और सम्मान के प्रतीक बने महाराणा प्रताप जब झालाराव मन्नासिंह के अनुरोध पर हल्दी घाटी से निकलकर चले तो उन्हें जाते हुए दो घुड़सवारों ने देख लिया। बस, यह देखते ही उन दोनों ने महाराणा प्रताप के पीछे अपने घोड़े डाल दिये। उन्हें महाराणा का वध करके अकबर से पुरस्कार पाने का यह उत्तम अवसर प्रतीत हुआ। हो सकता है कि पुरस्कार पाने की इच्छा के वशीभूत होकर उन्होंने महाराणा को युद्घ क्षेत्र से भागते हुए देखकर स्वयं ही उनका पीछा करना श्रेयस्कर समझा। राणा अपने गंतव्य की ओर बढ़े जा रहे थे, उन्हें अपने देश की चिंता और उस चिंता से मुक्ति दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे अपने वीर योद्घा साथियों की स्मृति बार-बार सोच के सागर में डुबा रही थी। एक योद्घा के लिए यह क्षण बड़े ही असमंजस के थे। वह सोच रहे थे कि युद्घ से इस प्रकार हट जाना पीठ दिखाना है, या समय के अनुसार लिया गया उचित निर्णय है?
चेतक की दयनीय स्थिति
उन्हें यह तनिक भी अनुभूति तक नही थी कि कोई उनका पीछा कर रहा है। पर्याप्त दूरी बना लेने पर महाराणा ने जब पीछे मुडक़र देखा तो ज्ञात हुआ कि दो मुगल सैनिक उनका पीछा कर रहे थे। महाराणा उन्हें देखकर सावधान हो गये। पर उन्हें अपने घोड़े चेतक पर अब अधिक विश्वास नही रह गया था, क्योंकि घोड़ा बहुत भयानक रूप से घायल था। मार्ग में एक नदी पड़ती थी जिसमें से चेतक किसी प्रकार निकल गया, पर उसके घावों के लिए यह ठीक नही था कि उसे उस अवस्था में नदी में उतारा जाता। महाराणा उन परिस्थितियों में विवश थे और उन्होंने विवशता वश ही अपने प्राणप्रिय घोड़े को नदी में उतारा था। चेतक ने भी साहसपूर्वक अपने स्वामी को नदी के उस पार कर दिया।
शक्तिसिंह ने की भूल सुधार
राणा ने नदी के पार होते ही पीछे मुडक़र पुन: देखा तो दोनों मुगल सैनिक पीछे नही हटे थे। वह निरंतर पीछा कर रहे थे। उधर घोड़ा चेतक अब थकता और टूटता जा रहा था, बड़ी भयानक स्थिति में महाराणा फंस चुके थे।
भूल हो जाना मानव की प्रकृति में है। यह कभी अनजाने में तो कभी परिस्थितियों वश भी हो जाया करती है। इन दोनों परिस्थितियों में ही होने वाली भूलों के विषय में यह अपेक्षा रहती है कि समय आने पर इनमें सुधार होना संभव है। क्योंकि भूल करने वाला समय आने पर जैसे ही सच से अवगत होगा तो उसे भूल सुधारने में देर नही लगेगी।
महाराणा प्रताप के भाई शक्तिसिंह के साथ ऐसा ही हुआ। उसके विषय में हम पूर्व में भी स्पष्ट कर चुके हैं कि वह बचपन से ही अत्यंत वीर था। उसकी रगों में महाराणा सांगा का रक्त प्रवाहित हो रहा था और वह अपने पूर्वजों के समान ही वीर और साहसी भी था, साथ ही अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता के चल रहे संघर्ष का मूल्य भी भली प्रकार जानता था। यह परिस्थितियों का प्रवाह था कि एक अवसर पर दोनों भाई अलग-अलग हो गये थे और शक्तिसिंह ने अकबर के दरबार में अपना शीश जा झुकाया था। पर उसने जब अकबर के दरबार में अपने भाई की वीरता और स्वाभिमान की कथाएं सुननी आरंभ कीं और आज उसी स्वाभिमानी भाई के प्राणों पर झूमते संकट को देखा तो उसका मन अपनी भूल पर प्रायश्चित करने लगा।
हल्दीघाटी का भयंकर युद्घ हो रहा था। महाराणा प्रताप ने उस युद्घ में अपने भाई शक्तिसिंह को नही खोजा, वह मानसिंह को खोज रहे थे, और शक्ति को छोड़ रहे थे, क्योंकि शक्तिसिंह के प्रति उनके हृदय में कहीं न कही भ्रातृ भाव बना हुआ था, इसलिए वह उसे आज अपने हाथों किसी भी प्रकार का 'दंड' देना नही चाहते थे। उधर शक्तिसिंह भी अपने भाई की ओर जाकर उन्हें अपना चेहरा नही दिखाना चाहता था, क्योंकि वह अपने किये हुए पर लज्जित था। इस प्रकार की परिस्थितियों से स्पष्ट होता है कि महाराणा और शक्ति सिंह दोनों ही अब अपनी भूल पर प्रायश्चित कर रहे थे।
शक्तिसिंह ने महाराणा प्रताप को मुगल सैनिकों से अकेले घिरे हुए भी देखा और चूंकि वह उस समय महाराणा को बड़ी सूक्ष्मता से देख रहा था तो इसलिए झालाराव मन्नासिंह की उस चतुराई को भी उसने देख लिया था जिसमें मन्नासिंह ने महाराणा का राजछत्र अपने सिर पर रखकर महाराणा प्रताप को बड़ी सावधानी से युद्घ क्षेत्र से निकाल दिया था। उसने देखा कि महाराणा अपने चेतक पर सवार हुए युद्घ क्षेत्र से सकुशल निकल रहे हैं तो उसे बड़ी प्रसन्नता हुई। परंतु उसकी प्रसन्नता अधिक काल तक स्थायी नही रह सकी।
भाई की रक्षा के लिए दौड़ लिया शक्तिसिंह
उसने देखा कि मेवाड़ाधिपति महाराणा प्रताप के पीछे दो मुगल सैनिक दौड़ रहे हैं, तो उसे आसीम कष्ट हुआ। उसका भ्रातृत्व तड़प उठा। उसे लगा कि आज उसके पूर्वजों का सम्मान और उसके परिवार का गौरव संकट में है? उसने स्वयं से ही पूछा कि क्या मेरे रहते यह सब संभव है? उत्तर मिला यदि महाराणा को मेरे देखते देखते कुछ भी हो गया तो इस पाप के लिए मैं भी पापी होऊंगा,और भगवान एकलिंगजी मुझे इसके लिए कभी भी क्षमा नही करेंगे।'
हृदय से अत्यंत पवित्र भावों से भरे हुए शक्तिसिंह का विचार प्रवाह ज्यों-ज्यों बलवती होता जाता था, त्यों-त्यों वह भाई की रक्षा के लिए लालायित होता जाता था। समय ना बात करने का था और ना ही अधिक देर तक कुछ विचारने का था।
यह समय केवल निर्णय लेने का था। इसलिए बिना समय गंवाये शक्तिसिंह ने निर्णय लिया और महाराणा की प्राणरक्षा के लिए अपना घोड़ा उन मुगल सैनिकों के घोड़ों के पीछे डाल दिया जो महाराणा प्रताप का वध करने के उद्देश्य से उनका पीछा कर रहे थे।
चाणक्य का कथन है....
चाणक्य ने कहा है कि-''जैसे काटा हुआ चंदन का वृक्ष सुगंध नही छोड़ता, बूढ़ा हो जाने पर गजराज अपनी लीला नही छोड़ता, कोल्हू में पेरी गयी ईख मधुरता नही छोड़ती वैसे ही दरिद्र (अत्यंत विषम परिस्थितियों में फंसा व्यक्ति) हो जाने पर भी कुलीन व्यक्ति सुशीलता (अपने कुल की मर्यादा) आदि गुणों का परित्याग नही करता है।''
कुल मर्यादा वास्तव में संसार की सर्वोत्तम वस्तु है। उस पर प्राण तक न्यौछावर कर दिये जाते हैं। आज शक्तिसिंह कुल मर्यादा का पालन करने के लिए अपने भाई का प्राणरक्षक बनकर उनके पीछे चल दिया, जिसे वह अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता का सच्चा सेवक मानता था।
मैथिलीशरण गुप्त ने शक्तिसिंह जैसे वीरों के लिए ही लिखा है :-
'थे कर्मवीर कि मृत्यु का भी ध्यान कुछ धरते न थे।
थे युद्घवीर कि काल से भी हम कभी डरते न थे।।'
ओ नीला घोड़ा रा असवार
शक्तिसिंह आज कर्मवीर भी था, युद्घवीर भी था, दानवीर भी था और धर्मवीर भी था। अपने कर्मवीर्य, युद्घवीर्य, दानवीर्य (महाराणा के लिए अपना जीवनदान करने की भावना के साथ) और धर्मवीर्य की चतुरंगिणी सेना लेकर शक्तिसिंह अंतत: उसी नदी पर जा पहुंचा जिसे महाराणा ने अभी-अभी पार किया था। राणा के पीछे-पीछे ही दोनों मुगल सैनिक भी नदी को पार कर गये थे। राणा को घोड़े की दयनीय स्थिति का मान था, इसलिए सुरक्षा के लिए कोई व्यक्ति दूर-दूर तक दिखायी नही देता था। घोड़े के घायल होने के कारण वे दोनों मुगल असवार राणा के निकट पहुंच गये और राणा पर प्राण लेवा प्रहार करने ही वाले थे कि इतने में पीछे से एक कडक़ती हुई आवाज आयी-'ओ नीला घोड़ा रा असवार। (ओ नीले घोड़े-चेतक के असवार)' इससे उन दोनों मुगल सैनिकों को झटका लगा। महाराणा ने उस आवाज देने वाले व्यक्ति की ओर देखा। देखते ही महाराणा को क्रोध आ गया, वे शक्तिसिंह के यहां आने का मंतव्य समझने में चूक कर गये, उन्हें लगा कि शक्तिसिंह आज उनसे शत्रुता साधने यहां तक आया है। उन्होंने प्रेमपूर्ण क्रोध में अपने भाई से कहा -'अरे मूर्ख! शक्तिसिंह तू आज मुझे विपत्ति में पड़ा देखकर मेरा वध करने आया है, यह तेरे लिए शोभनीय नही है, पर चल आ जा, आज या तो तू है या मैं हूं।'
कर दिया घातकों का वध
शक्तिसिंह भाई के क्रोध को समझ सकता था। इसलिए मौन रहा। पर निकट जाते ही इससे पूर्व कि वे मुगल सैनिक शक्तिसिंह के आने के उद्देश्य को समझ पाते उसने उनके निकट पहुंचकर अपने भाई के शत्रुओं को एक ही झटके में मृत्युलोक पहुंचा दिया। इसके पश्चात जिस भाले से शक्तिसिंह ने अपने भाई के शत्रुओं का नाश किया था उसे एक ओर फेंककर शक्तिसिंह दोनों हाथों को जोडक़र एक अपराधी की मुद्रा में अपने भाई महाराणा की ओर बढ़ा।
हुआ राम-भरत का मिलन
इससे पूर्व कि महाराणा कुछ और समझ पाते उनका छोटा भाई आज पुन: 'भरत' बनकर उनके चरणों में पड़ा था। अपनी भेल पर प्रायश्चित कर रहा था और बार-बार अपनी भूल के अपराध क्षमायाचना किये जा रहा था। उसकी आंखों में प्रायिश्चित के आंसू थे। उसे लग रहा था कि मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे भाई को सही समय पर सहायता न देकर उसने कितना बड़ा अपराध कर डाला है? वह हृदय से कहे जा रहा था-'भ्राताश्री मैंने आपको व्यर्थ ही इतना कष्ट दिया है, मुझे क्षमा कर दो-क्षमा कर दो।'
महाराणा को अनुज शक्तिसिंह के शब्दों में अद्भुत सा आकर्षण दिखाई दिया। उस आकर्षण ने महाराणा के हृदय को ऐसा पिघलाया कि ऊपरी आवरण में लोहे की भांति कठोर दिखने वाला महाराणा थोड़ी सी सेंक पाकर वैसे ही बह चला जैसे थोड़ी सी गरमी पाकर बरफ का पहाड़ पिघल जाया करता है। महाराणा की आंखों में भावनाओं की गंगा-जमुना बह चलीं।
दोनों भाईयों ने एक दूसरे को बांहों में ले लिया। दोनों ने भावनाओं का सागर बहने दिया, और मिलकर जी भर कर रोये। बिना कहे ही सारी भूल-चूक ऐसे कहीं अनंत में विलीन हो गयीं कि जैसे हवा में कपूर उड़ जाता है। कुछ कहा नही गया, पर सब कुछ कह दिया गया। हृदय पवित्र हो गया तो दोनों शांत हुए।
अब कुछ चेतक के विषय में
जब कृतज्ञता का भाव हृदय में हो और व्यक्ति किसी के उपकार को हृदय से स्मरण करना अपना पवित्र कत्र्तव्य मानता हो तो उस समय उपकार करने वाले के प्रति व्यक्ति नतमस्तक हो ही जाता है। महाराणा प्रताप हृदय से दयालु थे।आपत्ति काल में उनके चेतक घोड़े ने उनका जिस प्रकार साथ दिया था, उसके प्रति वह हृदय से कृतज्ञ थे। चेतक चाहे पशु था पर महाराणा उसके प्रति बहुत ही विनम्र दयाभावी थे।
आज उसने महाराणा को सुरक्षित रूप से नदी पार कराके महाराणा पर ही नहीं संपूर्ण हिंदू जाति पर भी उपकार किया था। गंभीर रूप से घायल चेतक अब अपने जीवन की अंतिम सांसेें गिन रहा था। एक ओर दो मुगल सैनिकों के शव पड़े थे और दूसरी ओर महाराणा और शक्तिसिंह का 'राम-भरत मिलाप' हो रहा था और उधर चेतक धरती पर पड़ा अपने जीवन मेले को समेट रहा था। उसके चेहरे पर संतोष था, मानो शक्तिसिंह के द्वारा दो मुगल सैनिकों का अंत कर देने पर वह अपने स्वामी के निष्कंटक जीवन से अब संतुष्ट हो गया था।
चेतक का अंतिम संदेश
आज अपने अंतिम प्रस्थान से पूर्व महाराणा का यह प्राणप्रिय घोड़ा दोनों भाईयों को भी अपना अंतिम संदेश दे रहा था कि-'दोनों सदा मिलकर रहना, एक दूसरे के रक्षक बनना-भक्षक नही, शत्रु प्रबल है, उसके छल-छद्मों से सावधान रहना, मातृभूमि के लिए अपना स्वतंत्रता संघर्ष निरंतर जारी रखना.....मेरा अंतिम प्रणाम।'
घोड़े चेतक ने महाराणा प्रताप की ओर निश्चिंत भाव से देखा, मानो पुन: एक संकेत अपनी मूक भाषा में दे गया कि-'महाराणा! आपके घातक शत्रुओं का अंत शक्तिसिंह ने कर दिया है, आपके साथ अब शक्तिसिंह की 'शक्ति' भी आ मिली है, इसलिए मुझे अब चलने की अनुमति दीजिए, कष्ट अब अधिक नही सहा जाता।'
चेतक ने इन्हीं मनोभावों के मध्य अपना जीवन मेला समेट लिया। उसकी आंखों से जलधार बह रही थी, मानो अपने स्वामी के वियोग को अब वह सहन नही कर पा रहा था। महाराणा को भी चेतक के वियोग पर असीम दुख हुआ। उन्होंने अपने चेतक का बड़े सम्मानभाव से अंतिम संस्कार किया और अपने इस प्राणप्रिय घोड़े का वहां एक स्मारक स्थापित कराया जो अभी तक स्थापित है। महाराणा ने फूट-फूटकर रोते हुए अपने घोड़े को अपनी श्रद्घांजलि अर्पित की और उसके वियोग का दुख उनके हृदय में आजीवन रहा।
झालाराव मन्नासिंह शक्तिसिंह और चेतक
भारत के तत्कालीन स्वातंत्रय समर में शक्तिसिंह और चेतक दोनों का ही महत्वपूर्ण स्थान है। क्योंकि दोनों ने ही अपने प्राणों को संकट में डालकर या प्राणों की आहुति देकर स्वतंत्रता के परम योद्घा महाराणा प्रतापसिंह की प्राण रक्षा की। यदि शक्तिसिंह और चेतक उस दिन अपनी स्वामी भक्ति का प्रदर्शन करने में चूक कर जाते तो महाराणा के साथ कुछ भी होना संभव था। हमें इन दोनों के साथ-साथ झालाराव मन्नासिंह के प्रति भी ऐसा ही सम्मान भाव प्रकट करना चाहिए। जिन्होंने महाराणा को हल्दीघाटी युद्घ से सुरक्षित निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। कितने दुख की बात है कि इस मध्यकालीन इतिहास के स्वतंत्रता संघर्ष को प्रथम तो स्वतंत्रता संघर्ष ही नही माना जाता, और यदि इसका कुछ वर्णन किया भी जाता है तो अकबर की चाटुकारिता करते-करते इसे बहुत ही हल्का करके प्रस्तुत किया जाता है। अत: महाराणा को ही कम करके आंकने की इतिहासकारों की आपराधिक प्रवृत्ति से हमारा मध्यकालीन इतिहास ग्रसित है। इसलिए मन्नासिंह हों, चाहे शक्तिसिंह हों और चाहे चेतक घोड़ा हो सभी हमारे लिए उपेक्षणीय हो गये हैं।
दोनों भाईयों ने ली एक दूसरे से विदा
महाराणा प्रतापसिंह ने घोड़े चेतक को अपना अंतिम प्रणाम किया। समय बहुत तेजी से व्यतीत हो रहा था, शत्रु से सावधान रहना समय की आवश्यकता थी। इसलिए महाराणा और शक्तिसिंह दोनों ने ही एक दूसरे से विदा ली। शक्तिसिंह ने अपना घोड़ा महाराणा को दिया और स्वयं ने उन मुगल सैनिकों के घोड़े को लिया, जिसे उसने अभी-अभी मारा था और वहां से उसने प्रस्थान कर दिया।
महाराणा यहां से अरावली पर्वत में आगे चले गये और शक्तिसिंह अकबर की सेना की ओर चले गये। शक्तिसिंह के विषय में एक मिथ्या कथानक लोगों ने जोड़ दिया है कि अकबर के शिविर में पहुंचने पर वहां उससे सलीम ने सारा विवरण जब सच-सच पूछा तो सलीम के इस विश्वास पर कि वह उसके विरूद्घ कुछ नही करेगा, उसने सब कुछ सच-सच ही बता दिया कि भाई के प्राणों पर संकट आया देखकर वह उसे देख नही पाया और वह उन मुगल सैनिकों का पीछा करते -करते वहां तक चला गया और भाई की रक्षा के भाव से प्रेरित होकर उसने स्वयं उन मुगल सैनिकों का अंत कर दिया था। कहा जाता है कि सलीम ने उसे अपने दिये हुए वचन के अनुसार वहां से सुरक्षित निकाल दिया।
इस कहानी पर नवीन अनुसंधानकर्ता प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। उनका तर्क है कि हल्दीघाटी के युद्घ के समय सलीम की अवस्था केवल छह वर्ष की थी इसलिए इसका युद्घ में उपस्थित रहना असंभव था। परंतु कर्नल टॉड जैसे लेखकों ने सलीम की उपस्थिति मानी है। कुछ भी हो शक्तिसिंह एक बार अकबर की सेना में गया और फिर वहां से लौटकर स्थायी रूप से अपने भाई राणा प्रताप के साथ आकर रहने लगा।
अकबर को राणा का सुरक्षित रह जाना अच्छा नही लगा था
अलबदायूंनी कहता है कि 'बादशाह अकबर को जब हल्दीघाटी के युद्घ में मिली सफलता की सूचना दी गयी तो यह सुनकर बादशाह सामान्य रूप से तो प्रसन्न हुआ, परंतु राणा का पीछा न कर उसको सुरक्षित जिंदा रहने दिया, इस पर वह बहुत क्रुद्घ हुआ। अमीरों ने विजय के लिखित वृतांत के साथ रामप्रसाद हाथी को जो लूट में हाथ लगा था और जिसको बादशाह ने कई बार महाराणा से मांगा था, परंतु दुर्भाग्य से वह नटता ही रहा था-बादशाह के पास भेजना चाहा।'
अकबर बादशाह के लिए हल्दीघाटी की विजय इतनी महत्वपूर्ण नही थी, जितना महाराणा का सुरक्षित रह जाना दु:खदायी था। क्योंकि वह जानता था कि यदि महाराणा जीवित रह गया तो हल्दीघाटी का युद्घ अनिर्णीत ही रह गया, समझा जाना चाहिए और यह निर्णय तब तक नही हो सकता जब तक भारतीय स्वतंत्रता का पुरोधा महाराणा प्रतापसिंह जीवित रहेगा।
अत: अकबर के लिए 'विजयोत्सव' महाराणा के जीवित रहने के कारण रंग में भंग पडऩे वाला सिद्घ हुआ। जब शत्रु पराजित योद्घा के भय से अपना विजयोत्सव भी नही मना पाए, तो सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि हल्दीघाटी के योद्घा महाराणा प्रतापसिंह थे न कि अकबर।
क्रमश:
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