विदेशी मेहमान और हमारे नेतागण

विदेशी मेहमान और हमारे नेतागण
अंग्रेजों ने सन 1947 ई. में सत्ता का हस्तांतरण सिर्फ उन लोगों को किया जो उनकी आस्थाओं और उनकी धार्मिक मान्यताओं को उनके जाने के बाद भी यहां जीवित रख सकते थे। साथ ही ऐसा सामाजिक परिवेश सृजित कर सकते थे कि जिसमें ईसाइयत का प्रचार-प्रसार संभव हो सके। इसलिए यहां पर 'सैक्युलरिज्मका वाक्य गढ़ा गया।
सन 1947 ई. में सत्ता के दो दावेदार और भी थे-एक यहां के रजवाड़े और दूसरे यहां  के क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े हमार नेतागण। जबकि कं्रातिकारियों को सत्ताविरोधी से राष्ट्रविरोधी और व्यवस्था विरोधी से समाजविरोधी बनाने में कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार दोनों का मत समान था,  दोनों के उद्देश्य समान थे। अ: सुभाष बाबू और वीर सावरकर जैसे कितने ही पुरोधा इन प्रयासों और उद्देश्यों की बलि चढ़ा दिये गये।
अंतर्राष्ट्रीय दबाव और ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरूद्घ बने वातावरण ने अंग्रेजों को यहां बोरिया बिस्तर बांधने के लिए जब विवश कर दिया तो अंग्रेजों ने बड़ी सावधानी और चालाकी से सत्ता कांग्रेस को सौंप दी। यही एक विवश पिता का नियम भी है। जो बेटा सबसे अधिक सेवा सुश्रूषा करता हैआज्ञा पालन करता हैऔरों की तुलना में पिता का अधिक मन जीतकर रखता हैतो पिता संसार से जाते समय उसी को ताज पहना दिया करते हैं। दाराशिकोह और औरंगजेब की लड़ाई में दाराशिकोह की सेवाएं और मानवीय आचरण से उपजी आत्मीयता के कारण शाहजहां का उसकी ओर झुकाव भी यही एक कारण था।
इसी गलती के लिए शाहजहां को बेटे की कैद में रहना पड़ा। सन 1947 ई. के पश्चात अंग्रेजों के मानस पुत्रों का सत्ता पर जब कब्जा हुआ तो उन्होंने भी भारत माता के सच्चे सपूतों (क्रांतिकारियों) को उपेक्षा की कैद में डाल दिया। इन सत्ताधीशों का उद्देश्य प्रारंभ से ही उन क्रांतिकारियों के विचारों के विपरीतगामी रहा। उनके आदर्शोंमान्यताओं और उद्देश्यों के विपरीत दिशा में कार्य करता रहा। क्रांतिकारियों की मान्यता थी कि हम स्वतंत्रता के उपरांत भारत और भारतीयता की बात करेंगे। इन्होंने कहा हम'इंडियाऔर 'इंडियनिटीकी बात करेंगे।
क्रांतिकारियों ने कहा कि हम भारत के मूल्यों की बात करेंगेउन्हें प्रतिब्यापित करेंगे। उधर नेताओं ने कहा कि हम रूढि़वाद के उन सभी सोपानों को उखाड़ फेंकेंगे जो इंडिया को बसाने और बनाने में सहायक नही होंगेचाहे भले ही ये सोपान भारत के आदर्श मूल्य ही क्यों न हों यथा-
-यदि हमें गाय का मांस 'इंडियाको परोसना पड़ा तो हम परोसेंगे।
-यदि हमें 'यौवनऔर 'रूपको नचाकर विदेशी मेहमानों को प्रसन्न करने की जरूरत पड़ी तो हम यह भी करेंगे।
-यदि हमारी वैदिक विश्व व्यवस्था और वैदिक समाज व्यवस्था को वह उपेक्षित करेंगे तो इससे अधिक उपयुक्त उत्तराधिकारी अंग्रेजों के लिए गांधी-नेहरू जैसे कांग्रेसियों के अतिरिक्त और कौन हो सकता था। क्योंकि इन कांग्रेसियों का राष्ट्रीयगान कभी उनके लिए यह भी रहा था कि-
यशस्वी रहे हे प्रभोहे मुरारे।
चिरंजीव रानी व राजा हमारे।।
एक आकलन के अनुसार आज स्थिति यह आ ागयी है कि 'भारत' (देहात) और 'इंडिया' (शहर) का अंतर बढ़ता ही जा रहा है। इस अंतर के अनुसार भारत का नागरिक 'इंडियाके नागरिक से हर तरह से पिछड़ा हुआ है। अपनी जीवनोपयोगी वस्तुओं पर भारत का नागरिक 'इंडियाके सिटीजन की अपेक्षा 87 प्रतिशत कम खर्च कर पाता है और जैसे-तैसे ही जीवनचला पाता है। 'इंडियातरक्की कर रही है और 'भारतपिछड़ रहा है। क्योंकि भारत के मानसपुत्र (क्रांतिकारी) आज भी वैज्ञानिक कैद में हैं। अत: नवयुवक प्रेरणाहीन और दिशाहीन बना हुआ है। उन्हें यह मार्ग कौन दिखाये जिससे भारत की उन्नति होभारत के मूल्यों की रक्षा हो। आज विदेशी अतिथि आते हैं। करोड़ों रूपये उनके सम्मान मेंसुरक्षा प्रबंधों में पानी की तरह बहा दिये जाते हैं। देखिये 21 दिसंबर सन2003 ई. में सर्वहितकारी नाम पत्रिका में श्री सत्यवीर शास्त्री जी ने लिखा है-''आजकल हम देखते हैं कि जब कोई विदेशी अतिथि भारत में आता है तो ये भारत के कर्णधार उन्हें मांस खिलाते हैंमद्यपान कराते हैं। एवं भारत के पुत्र-पुत्रियों को नचाकर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न करते हैं। भारत गाय के गोश्त और 'गर्म गोश्तकी अच्छी मंडी बन गया है।''
जिस नारी को समानता के अधिकार दिलाने की बातें की जा रही हैंवह विदेशियों को परोसी जा रही है। वह भारत के मूल्यों के इस प्रकार के शोष्ज्ञण के विरूद्घ कोई भी आवाज नही उठा रहा। यहां तक कि नारी संगठन भी मौन है। पति के विरूद्घ बगावत और ससुराल पक्ष पर दबदबा बनाये रखने की नीति के लिए ही लगता है नारी संगठन नारी जागरण का काम कर रही है। दुखती रग पर हाथ रखने में ये भी आगे नही आना चाहते। ऐसी स्थिति में कैसे होगी इस राष्ट्र में नारी की रक्षाहोना तो यह चाहिए था कि अपने सांस्कृतिक मूल्यों की छटा विदेशियों के आगे बिखेरी जाती। किंतु ऐसा न करके हमने उनकी ही गलत नीतियों और रीतियों पर अपनी सहमति की मुहर लगा दी। अर्थात-
-गर्म गोश्त का सौदा तुम भी करते हो तो हम भी करेंगे।
-नारी को आदर्श गृहिणी तुम भी नही मानते तो चलो हम भी नही मानते।
-विवाह को तुम एक संविदा मानते हो तो चलो हम भी मानेंगे।
-अगली रियासत विचारधीन है कि कुंवारी कन्या से तुम्हारे यहां भगवान जन्म ले सकते हैं तो चलो हम भी कुंवारियों को यह छूट दे देंगे।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडयंत्र : दोषी कौन?' से)
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