विदेशी घुसपैठ और आरक्षण

आरक्षण
आज देश की राजधानी में 28 लाख अवैध बांग्लादेशी रह रहे हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय ने इनमें से प्रतिदिन कम से कम 200 लोगों को दिल्ली से बाहर निकालने का आदेश दिया है। जबकि परिणाम कुछ भी नही है। तेरह लाख बांग्लादेशी तो झुग्गियों के (अवैध) वैकल्पिक आवासीय भूखण्ड भी प्राप्त कर चुके हैं। खबरें ऐसी भी हैं कि अब कुछ बांग्लादेशी और पाकिस्तानी गलत प्रमाण पत्र लेकर भारत की सशस्त्र सेनाओं में भरती हो रहे हैं। जिसकी जांच के आदेश न्यायालय ने भेज दिये हैं। इस सारी प्रक्रिया के प्रति आंखें मूंदकर वोटों के लालच में ये देश के कर्णधार कहे जाने वाले नेता आज, देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।
आरक्षण की स्पर्धा
इस देश में आरक्षण देने वाले और मांगने वालों की कमी नही है। मांगने वाले अपने कटोरे में आरक्षण की भीख पड़ते ही खुश हो गये। दूसरे शब्दों में कहें तो भिखारी होने का प्रमाण पत्र पाकर प्रसन्न हो गये। अरे मांगना ही था तो आरक्षण शिक्षा में मांगा जाता। प्रतिभावान बच्चों और छात्र-छात्राओं को सरकार अपने खर्चे पर प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार करती शिक्षा सबके लिए नि:शुल्क की जाती।
प्रतिभावान प्रतियोगी छात्र छात्राओं को इस देश की सर्वोच्च सेवाओं पर नियुक्त किया जाता। शेष को उसी योग्यता के अनुसार अन्य कार्यों और सेवाओं में नियुक्त किया जाता। जो छात्र छात्राएं कुटीर उद्योग धंधे चलाने के लिए उपयुक्त समझे जाते उन्हें उनके लिए ऋण देने की व्यवस्था की जाती। इस विषय पर हम आगे भी प्रकाश डालेंगे।
वयं राष्टे् जागृयाम पुरोहित:’
अर्थात राष्ट्र जागरण करने के लिए भी कुछ युवकों की टीम तैयार की जाती। कुछ छात्रों का काम ही राष्ट्र, धर्म, संस्कृति और इतिहास की जानकारी राष्ट्रवासियों को कराना होता। चाहे इसके विषय में उन्हें विदेश भी जाना पड़ता। इनमें मनुवाद की सही व्याख्या, भारत के सामाजिक मूल्य, वर्ण व्यवस्था का वैज्ञानिक स्वरूप, यज्ञादि से लाभ, वेदों का महत्व, वेदों में मानव जीवन शैली, पर्यावरण प्रदूषण से हानियां व उन्हें दूर करने के उपाय, आदि समाज हित के कार्य सम्मिलित होते।


हम यह भूल जाते हैं कि मनुष्य का बच्चा मनुष्य से पैदा होकर भी जब तक उसे मानवीय संसर्ग और संपर्क नही मिलता तब तक वह मानव नही बन सकता। अत: उसे मानव बनाये रखने के लिए उसमें मानवता का समुचित विकास करना अपेक्षित है। इसीलिए ऐसे समाज सुधारकों को विधिवत विधायकों से शिक्षित और प्रशिक्षित विद्यालयों से शिक्षित और प्रशिक्षित कर तैयार करके निकालने की आवश्यकता है। इसलिए सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए था। दुर्भाग्य से ऐसा नही किया गया।
यहां के नाटककार कर्णधारों ने राष्ट्रवासियों की आंखें बंद कर नाटकीय जादू चलाने का धंधा अपना लिया। अपने पिटारे से नये-नये सांप निकालकर दिखाने लगे। बीन बजा-बजाकर जनता का मन मोह लिया। इस पिटारे में से जब आरक्षण का सांप निकला तो जनता मारे खुशी के उछल पड़ी। जैसे तुम्हारी सारी समस्याओं का निदान अब होने वाला है। इन भोलों से कोई ये पूछे कि क्या सांपों से भी कभी समस्याओं का समाधान हुआ है? जो स्वयं ही एक समस्या है वे दूसरों की समस्या का क्या समाधान करेंगे?
जैसा कि हमने पूर्वोल्लेख किया है कि उच्च पदों व सेवाओं का आरक्षण तो खास लोगों ने अपने लिए कर लिया है जिसमें नौकरशाही, हमारे प्यारे कर्णधार, नौकरी माफिया, उद्योगपति आदि सम्मिलित हैं। अन्य लिपिकीय वर्ग और चतुर्थ श्रेणियों के कर्मियों के लिए मारामारी हो रही है। आरक्षण देकर भी प्रतिभा का विकास यहां तक है। इससे आगे नही, ये कैसी आरक्षण व्यवस्था है?
कुछ लोगों को आरक्षण के आधार पर पदोन्नति देकर दूसरों की वरीयता को पीछे कर दिया गया है, यह आरक्षण के नाम पर घोर अन्याय है। कुछ सीटों को ऐसे अयोग्यों से भर लिया गया है कि उन्हें उस पद की गरिमा तक का भी ध्यान नही है। फलस्वरूप भ्रष्टाचार देश में और भी अधिक फैला है। ऐसा करना भी राष्ट्र की प्रतिभाओं का शोषण करना है। राष्ट्र की कुछ प्रतिभाओं को इसलिए उपेक्षित कर देना कि तुम सवर्ण हो इसलिए योग्य होते हुए भी तुम्हें आगे नही जाने दिया जाएगा, यह राष्ट्र के साथ ही देखा है। लेकिन ऐसा हो रहा है। इसके रूकने का कोई संकेत भी नही दिखाई दे रहा है। जिन लोगों ने कभी निरंकुशता दिखाकर किसी वर्ग विशेष को पीछे छोड़ दिया था, उसका शोषण और उत्पीडऩ किया था, आज उस वर्ग को कानून बनाकर पहले वर्ग का शोषण और उत्पीडऩका अवसर दे दिया गया है।
फलस्वरूप समाज में ‘तिलक, तराजू और तलवार (ब्राह्मण, वैश्य और क्षत्रिय) इनको मारो जूते चार’ के प्रतिशोधात्मक नारे लगे हैं। भला इन नासमझों से कोई ये पूछे कि जो हाथों में तलवार थामने की हिम्मत रखता हो तो वह इनको जूते कैसे खा लेगा? हां तिलक और तराजू की बात अलग है, परंतु वहां भी अगर बुद्घि के द्वारा आकलन किया जाएगा तो भी इनके जूते चलने वाले नही हैं। क्योंकिबुद्घिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्घिमस्तो कुतो बलं’ अर्थात जिसमें बुद्घि है वही बलशाली है निर्बुद्घि का संसार में कोई बल नही है।
अत: वे भी इनके जूते छीन-छीनकर इन्हें ही मारेंगे। यह सिर्फ नासमझ लोगों को भडक़ाने व मूर्ख बनाने के नारे मात्र है। जहां बुद्घि के द्वारा सबल बनाने की आवश्यकता थी, वहां इस प्रकार के भडक़ाऊ नारों से जनता का मूर्ख बनाया जा रहा है। यह हमारा दावा है कि स्वतंत्रता के बाद के इन वर्षों में भारतीय समाज से वर्ग संघर्ष की भावना और भी अधिक बलवती हुई है। जब कि यह मध्यकालीन इतिहास की दुर्भावना का दानव मिटना चाहिए था। इसी कारण कुछ लोगों ने अंबेडकर को अपना बना लिया तो कुछ लोग प्रतिशोध में उन्हें पराया समझने लगे हैं। महापुरूषों तक का विभाजन और आरक्षण हो रहा है, और हम कह रहे हैं कि ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ इसमें-
– वर्ग, जाति और धर्म को बढ़ावा न देने की संविधान की मूल भावना के साथ खिलवाड़ करने का अधिकार इन कर्णधारों को किसने दे दिया? इधर वर्ग संघर्ष को बढ़ाने के लिए आरक्षण का विषय समाज में उछाल दिया और उधर आईएएस, पीसीएस और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्न-पत्र लीक कराकर अपने चहेतों को उच्च पदों पर बैठाने का पूरा जुगाड़ बना लिया। अब इस नीति का पर्दाफाश कर माफियाओं के विरूद्घ बिगुल बजाना ही एक मात्र उपाय है। अत:
उत्तिष्ठत जागृत प्राप्यवरन्निबोधयति’
अर्थात उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक बढ़ते रहो। उपनिषदों का यह जीवंत संदेश आज हमें किस ओर संकेत कर रहा है? उसे पहचानना आज की युवाशक्ति के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हो गया है।
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडयंत्र: दोषी कौन?’ से)
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