
हम आरक्षण व्यवस्था के विरूद्घ नही हैं। आरक्षण होना चाहिए, किंतु ऐसी व्यवस्था भी होनी चाहिए कि किसी की पात्रता का उल्लंघन अथवा उपेक्षा न हो, किसी के अवसरों का हनन न हो। कोई भी वर्ग कुंठा या घुटन अनुभव न करे। इसके लिए आवश्यक है कि व्यक्ति को संस्कार आधारित शिक्षा प्रदान की जाए। जिससे वह स्वयं तो बढ़े ही दूसरों के बढऩे में भी सहायक बने। टंगड़ी मारकर आगे बढऩे की नीति समाज के लिए घातक सिद्घ होती है। उसे अधिक देर तक कोई भी सभ्य समाज सहन नही कर सकता। विशेषकर उन परिस्थितियों में तो हालात और भी विस्फोटक हो जाते हैं जब किसी को कुछ देने का नाटक तो किया जाए किंतु वास्तव में दिया कुछ न जाए।
महिलाओं के लिए आरक्षण के विषय में भी हमारी यही मान्यता है कि उन्हें भी संस्कारित व शिक्षित करके पाखण्ड व अंधविश्वासों से मुक्ति दिलाने की आवश्यकता है। भारतीय संस्कृति में पति, पत्नी के शाश्वत अनूठे प्रेम को पढ़ी-लिखी नारी ही कहीं अधिक तिलांजलि देती जा रही है। तलाक के मामलों में पढ़ी-लिखी नारी ही अधिक संलिप्त होती दिखती है। ठीक है कि उसे पढ़-लिखकर समानता के अधिकार की जानकारी हुई, परंतु समानता का एक तात्पर्य गृहस्थ के दो पहियों की समान गति बनाये रखने से भी है। यदि सीमा से बाहर जाकर उच्छ्रंखलता का प्रदर्शन करते हुए एक पक्ष के द्वारा गति बढ़ाई गयी तो गृहस्थ की गाड़ी चलनी असंभव हो जाएगी।
नारी स्वतंत्र हो, हर प्रकार के अत्याचार, अन्याय, उत्पीडऩ से भी मुक्त हो, किंतु साथ ही वह अमर्यादित, असंतुलित और उच्छ्रंखल भी न हो, यह भी देखना है। पुरूष-वर्ग को अपनी सीमाएं पहचाननी हैं और नारी वर्ग को अपनी सीमाएं ज्ञात करनी हैं। आज अधिकार दिये जा रहे हैं और लिए भी जा रहे हैं, कल को अधिकार छिनेंगे। क्योंकि स्वतंत्रता के अधिकार के पीछे कत्र्तव्य और मर्यादा की नकेल नही डाली जा रही है।
ऐसी परिस्थितियों में जैसे आज संसद और विधानसभाओं में जनादेश का सार्वजनिक रूप से गला घोटकर हमारे जनप्रतिनिधि अवैधानिक कार्य करते हैं उस दशा में बहुत संभव है कि कल को अशिक्षित महिला सांसद बहुमत से दल बदलकर या नई पार्टी बनाकर सत्ता पर अधिकार कर लें, तब हो सकता है कि जाति आरक्षण की भांति पात्रों को पीछे धकेलकर अपात्र सेना सत्ता और शासन पर पहुंच जाए। अभी तक के अधिकांश कानूनों के परिणाम, व्यवस्था और नीति के परिणाम, स्वतंत्र भारत में इसी प्रकार के रहे हैं कि जिस उद्देश्य की प्राप्ति के वशीभूत होकर उन्हें लागू किया जाता है, परिणाम उद्देश्य के अनुरूप न आकर सर्वथा विपरीत ही आता है। उदाहरणत: जनप्रतिनिधियों के विषय में अपेक्षा थी कि उनकी साफ सुथरी और उजली छवि होगी, जबकि परिणाम ये निकला कि गुण्डे बदमाश और लुच्चे लफंगे तक संसद में पहुंच रहे हैं। बिकाऊ लोकतंत्र जनादेश का सम्मान करना लोकतंत्र का प्राण है। जहां जनादेश का सम्मान करने की भावना समाप्त हो जाती है, वहां समझना चाहिए कि लोकतंत्र की हत्या की जा रही है। यह मानना पड़ेगा कि पंडित जवाहर लाल नेहरू जी के समय में इस देश में कई क्षेत्रों में लोकतंत्र ने अपनी जड़ें गहरी जमाई थीं। उनके समय में संसद में उनकी पार्टी के सांसद भी सरकार की आलोचना राष्ट्रहित में कर लिया करते थे। जहां नेहरू जी का स्वयं का लोकतंत्र प्रिय स्वभाव इसके लिए उत्तरदायी था, वहीं उस समय के अधिकांश सांसदों एवं जनप्रतिनिधियों का भारत की भूमि से जुड़ा होना भी एक कारण था। सरदार पटेल, लाल बहादुर शास्त्री, प्रकाशवीर शास्त्री, जी. बी. पंत सरीखे कितने ही नेताओं का जनता से सीधे-सीधे लगाव था और अपना एक आधार था। यद्यपि नेहरू जी के समय में कई क्षेत्रों में लोकतंत्र का हनन और पतन भी हुआ। परंतु इस सबके उपरांत भी उस समय जनता के प्रति निष्ठा को प्राथमिकता दी जाती थी। इंदिरा जी के समय में जनता के प्रति निष्ठा के इस भाव को गहरा आघात लगा। इंदिरा जी ने दल के प्रति और उससे भी पहले स्वयं के प्रति निष्ठा को प्राथमिकता दी। आज जी को उनकी दल और व्यक्ति के प्रति निष्ठा रखने और उनके द्वारा ऐसे लोगों उपकृत करने की नीति केक लिए कई राजनीतिक लोग उन्हें कोसते हैं। किंतु अपने-अपने दलों में अनुशासन के नाम पर तानाशाही का भय भी बनाये रखते हैं। कार्यकर्ता का, विधायक का, सांसद का और पदाधिकारी का अस्तित्व मिटाकर रख दिया जाता है। एक विधायक जी से हमारी बातें हो रही थीं, वह बड़े दुख से कह रहे थे कि ये लोग (पार्टी पर कमांड किये हुए सभी नेतागण) हम लोगों को सर्वप्रथम अकर्मण्य बनाते हैं। दिल्ली के चक्कर कटा-कटाकर थका देते हैं। प्रतिभा की सारी हवा को निकाल देते हैं। जिस शासन की ऐसी स्थिति हो, उसे लोकतंत्र कैसे कहा जा सकता है? इस कुव्यवस्था का परिणाम आज घातक रूप में हमारे सामने मौजूद है। आज पार्टी कार्यकर्ताओं में से विधायक और सांसद बनने बनाने को प्राथमिकता नही दी जाती है, अपितु थैली शाह ऊपर से ऊपर ही पार्टी टिकट खरीद लेते हैं। जिस दल के अधिक वोट होते हैं उस दल के प्रत्याशी का मूल्य उतना ही अधिक होता है। थैली शाह उसी दल के अधिक चक्कर भी लगाते हैं। पार्टी फंड के नाम पर लाखों नही करोड़ों तक का सौदा चला जाता है। राजनीति का पूरी तरह व्यक्तिकरण कर दिया गया है। राजनीतिक पार्टियां पहले तो अपने उम्मीदवार से मोटी रकम लेकर अपने दल के मतदाताओं को बेचती हैं, फिर उन मतदाताओं के मतों से निर्वाचित अपने विधायक और सांसदों का सौदा सरकार बनाने व गिरवाने में करती है। व्लॉक का चुनाव आता है तो ग्राम प्रधानों को खरीदा जाता है। एमएलसी का चुनाव होता है तो सारे निर्वाचक मंडल को खरीदा जाता है। जिला परिषद अध्यक्ष का चुनाव होता है तो जिला पंचायत सदस्यों को खरीदा जाता है। ऊपर जाकर सांसदों के मोलभाव होते हैं। अर्थात ‘हर माल मिलेगा ढाई आने’ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। नीचे से ऊपर तक सारे गधे-घोड़े बिकाऊ हैं। मतदाता भी मिठाई, शराब, दावत आदि लेकर ईमान बेच डालता है। बिकाऊ लोकतंत्र है अर्थात बिकाऊ लोक है और बिकाऊ ही तंत्र है।
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडयंत्र : दोषी कौन?’ से)
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