'मेरे दलित भाइयों को मत मारो'


भारत मूल रूप में जातिविहीन देश है। इसका कारण यह है कि भारत का मूल चिंतन जातिविहीन और वर्ग विहीन समाज की संरचना पर बल देने वाला रहा है। हमारा आदर्श एक जाति विहीन समाज की संरचना करके प्रत्येक व्यक्ति को 'ब्राह्मणबना देना हैआर्य बना देना है। 'सबका साथ-सबका विकास'-भारत की गौरवमयी विरासत भी है और वसीयत भी है। इस संकल्प में ना कोई पिछड़ा है और ना कोई अगड़ा हैना किसी के लिए आरक्षण की व्यवस्था है और ना किसी का तुष्टिकरण है। अपनी-अपनी प्रतिभा के विकास के लिए सबको समान अवसर देने की एक उत्कृष्ट मानवीय भावना है। सबको 'ब्राह्मणबना देने का अभिप्राय है-जिसमें सांसारिक राग-द्वेष का लेशमात्र भी ना होजो सब से प्रेम करता हो और जिससे सब प्रेम करते हों। ऐसी श्रेष्ठ व्यवस्था को भारत ने न केवल अपने लिए अपने लिए उचित समझा हैअपितु विश्व के लिए भी उचित समझा है।
इसके उपरांत भी कुछ लोग आत्मप्रवंचना के आत्मघाती खेल में लगे रहे हैं। ऐसे लोगों की मूर्खताओं के कारण ही हमारा वास्तविक ध्येय (सारे संसार को 'ब्राह्मणश्रेष्ठ या आर्य बनाना) हमसे कहीं विलुप्त हो गया। आज इस प्रकार की मूर्खता को समाप्त करने के लिए एक और बड़ी मूर्खता की जा  रही है कि जो ऊंची श्रेणी के लोग हैंउन्हें नीचे खींचा जा रहा है जिससे उन्हें अपने साथ अन्याय होता दिख रहा है। फलस्वरूप जातिवाद और भी अधिक फेेल रहा है। सही बात यह होगी कि जो ऊंची श्रेणी के हैं-उनकी प्रतिभा और योग्यता का सम्मान यथावत रखते हुए अधिक ध्यान नीचे की श्रेणी के लोगों में वैसी ही योग्यता और प्रतिभा का विकास करने पर लगाया जाए।
अब जातीय विसंगतियों के विरूद्घ विद्रोह की एक नई प्रक्रिया का विकास होता जा रहा है। देश के दलितों में से अपने समर्थकों के बड़े समूह को साथ लेकर कु. मायावती ने बौद्घ बन जाने की धमकी दी है। उन्हें संभवत: यह लगता है कि इस प्रकार की धमकी के क्रियान्वयन के फलस्वरूप वे भारत की कथित ब्राह्मणवादी व्यवस्था को या मनुवाद को तोडऩे में सफल हो जाएंगी। पर यह उनकी भूल ही होगी। क्योंकि ब्राह्मणवाद या मनुवाद किसी जाति विशेष का पोषक न होकर एक व्यवस्था का पोषक है और वह 'ब्राह्मण'उसी को मानता है जिसका बौद्घिक मार्गदर्शन पाकर लोग स्वयं ही संतुष्ट और प्रसन्न हों। जबकि क्षत्रिय वह है जिसके कारण लेाग अपने आपको स्वयं ही सुरक्षित समझें। 'ब्राह्मणअहंकारी या तानाशाही प्रवृत्ति का नही हो सकता और क्षत्रिय क्रूर या निर्दयी नही हो सकता।
मायावती चाहे कहीं भी चली जायें-इनसे अलग उन्हें 'ब्राह्मणया क्षत्रिय की परिभाषा तो उन्हें नही मिलनी। भगवान बुद्घ ने भी सज्जन सदाचारीक्षमाशील और तपस्वी व्यक्ति को 'ब्राह्मणमाना है। ब्राह्मणी के गर्भ से जन्मे व्यक्ति को 'ब्राह्मणनही माना,तथा तपसंयमब्रह्मचर्यशमदमसत्य आदि से युक्त होकर व्यक्ति 'ब्राह्मणबनता है-ऐसा कहा है। (भिक्षु धर्मरहित जातिभेद और बुद्घ पृष्ठ-6)
भगवान महावीर के अनुसार ''जो  निसंग और निशोक हैऔर वाणी  में रमता हैउसे हम 'ब्राह्मणकहते हैं। जो तपे हुए सोने के समान निर्मल हैराग द्वेष और भय से अतीत हैउसे हम 'ब्राह्मणकहते हैं। जो तपस्वी क्षीणकायजितेन्द्रियरक्त और मांस से अपचितसुव्रत और शांत हैउसे हम 'ब्राह्मणकहते हैं। जो क्रोध और लोभभय और हास्यवश असत्य नही बोलता-उसे हम 'ब्राह्मण'कहते हैं। जो स्वर्गीयमाननीय और पाशविक किसी भी प्रकार से अब्रह्मचर्य सेवन नही करताउसे हम 'ब्राह्मण'  कहते हैं। जिस प्रकार जल में उत्पन्न हुआ कमल उसमें ऊपर रहता है-उसी प्रकार जो काम भोगों से ऊपर रहता हैउसे हम 'ब्राह्मणकहते हैं।..... (उत्तरज्जयणाणि, 25 महायज्ञ)
इस प्रकार भारत के वैदिक धर्म की प्रत्येक शाखा व्यक्ति को 'ब्राह्मणया 'आर्यबनने की ओर लेकर चलती प्रतीत होती है। मायावती इस धर्मरूपी पेड़ की जिस शाखा पर भी जाकर बैठेंगी वही ंउन्हें 'कृण्वन्तो विश्वमाय्र्यम्का गीत अपनी स्वर लहरियों के साथ बहता जान पड़ेगा।
भारत की राजनीति 'कृण्वन्तो विश्वमाय्र्यम्के रहस्य को समझने में असफल रही है। इसने अपने मूल और प्राचीन परंतु जितना प्राचीन है उतना ही अधुनातन अर्थात सनातन मूल्य को किनारे करके चलने की मूर्खता की है और समाज में व्यक्ति को 'आर्यना बनाकर उसे 'ब्राह्मण' (जाति विशेष) गुर्जरजाटचमारभंगी बनाना आरंभ कर दिया। मायावती सहित कोई भी राजनीतिज्ञ ऐसा नही है जो व्यक्ति को उसकी जातिगत पहचान से बाहर निकालने का प्रयास करता दिखाई पड़ रहा हो। लगता है इन लोगों को देश के सनातन मूल्यों से ही घृणा हैया फिर ये जानबूझकर अपने मूल्यों से घृणा करने का नाटक कर रहे हैं।
अपनी वर्तमान राजनीति के कारण हमने अपना भारी अहित कर लिया है। हमने जीवन की उच्चतम व्यवस्था को प्राप्त करने की अपनी संघर्षशील प्रवृत्ति को रोककर 'जहां हैंजैसे हैंउसी में प्रसन्न रहने की अवैज्ञानिकअतार्किक और अप्राकृतिक मान्यता को विकसित कर स्वयं अपनी ही प्रतिभा की हत्या कर ली है। हमने आरक्षण की व्यवस्था इसलिए अपनायी कि हमारे समाज के प्रत्येक व्यक्ति की प्रतिभा का विकास हो और वह 'आर्यबन सके। पर यह आरक्षण की व्यवस्था भी रोटी और रोजगार की दलदल में जाकर फंस गयी और आज यह स्वयं अपनी असफलता पर आंसू बहा रही हैक्योंकि यह व्यवस्था भी व्यक्ति को श्रेष्ठ न बनाकर केवल 'बाबूही बना पायी हैजी हां वही 'बाबूजो सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार का बादशाह कहा जाता है। निकृष्ट और दिशाविहीन  स्वार्थी राजनीतिक चिंतन की परिणति है-यह अव्यवस्था। मनु महाराज (मनु. 2.168) कहते हैं कि वेदादिशास्त्रों को न पढऩे वाला ब्राह्मण भी शूद्रत्व को प्राप्त हो जाता है। ज्ञान और शिक्षा का अनुभव भी शूद्रत्व का लक्षण है।
लगता है हमारी सारी राजनीति इस समय सारे समाज को ही शूद्र बनाने की एक 'फैक्टरीमें परिवर्तित हो गयी है। सारी व्यवस्था शीर्षासन कर गयी है। लक्ष्य की पवित्रता और उत्कृष्टता (कृण्वन्तो विश्वमाय्र्यम्) भंग हो गयी है और निकृष्टता अपना नंगा नाच नाच रही है। इसी के चलते कुछ लोग शूद्रों पर गुजरात में हमले कर रहे हैंतो कुछ उन पर हमले करा रहे हैंजबकि कुछ उन हमलों का मजा ले रहे हैं और कुछ उन्हें रंगत देकर अपने स्वार्थ साधने की चेष्टा कर रहे हैं। हमारा विवेक मर गया हैअपने ही बंधुओं को हमने निकृष्ट मानकर उनके साथ अन्याय करने का क्रम छोड़ा नही है। जबकि आज की परिस्थितियों में तो हमें सारी छोटी बातों को छोडक़र 'चोटी की साधना' (उत्कृष्टता की प्राप्ति) में लगना चाहिए था। पर जो लोग 'चोटी' (सिर पर रखी जाने वाली शिखा) को पिछड़ापन मानते होंउन्हें क्या पता कि यह चोटी ही तो थी जो हमें शिखर की चोटी (ज्ञान और प्रतिभा के पूर्ण विकास के उच्चतम शिखर) को छूने के लिए सदैव प्रेरित करती रहती थी।
प्रधानमंत्री मोदी के ये शब्द मार्मिक हैं कि-''मेरे दलित भाईयों को मत मारो-चाहे मुझे गोली मार दो।'' मोदी उस षडय़ंत्र को समझ रहे हैं-जो इस देश को बांटने के लिए किया जा रहा है और मायावती बौद्घ बनने की धमकी देकर उस षडय़ंत्र को हवा दे रही हैं। जो लोग दलितों पर हमले कर रहे हैं-उन्हें रूकना होगा और दलितों को 'आर्यबनाने के लिए अपने सनातन धर्म की परंपरा का निर्वाह करना होगा। प्रेम की सृष्टि करते हुए स्नेह की दृष्टि अपनानी होगी। साथ ही दलित भाइयों को भी समाज के रचनात्मक और विवेकशील लोगों के साथ मिलकर भारत को पुन: जातिविहीन बनाने के संकल्प के साथ उठ खड़ा होना चाहिए।
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