महाराणा का मस्तक झुकाने को अकबर ने किये अनेकों यत्न

महाराणा का मस्तक झुकाने को अकबर ने किये अनेकों यत्न

विपदाएं दिखने में असहनीय होती हैं, पर उनके विषय में यह भी सत्य है कि व्यक्ति के जीवन का निर्माण भी विपदायें ही किया करती हैं। संसार के जितने भी महापुरूष हुए हैं उन सबने किसी न किसी प्रकार की विपदाओं का सामना अपने जीवन-काल में किया है। जो व्यक्ति जितने धैर्य, संयम और विवेक से उन विपदाओं का सामना कर गया, वह उतना ही महान कहलाया।
महाराणा की विपदाएं
महाराणा प्रतापसिंह का जीवन भी कुछ ऐसी ही विपत्तियों के भंवरजाल से बना था, जिनमें वह फंसे और सफलतापूर्वक बाहर निकले। महाराणा के जीवन में विपदाओं ने पिता के रहते ही बसेरा डाल लिया था। यह महाराणा ही थे-जो उन विपदाओं का पहले दिन से ही पूर्ण धैर्य और विवेक से सामना करते आ रहे थे। कहीं पर भी अपने धैर्य और विवेक पर महाराणा ने प्रश्नचिन्ह नही लगने दिया।
अकबर महाराणा को लेकर फंस गया था असमंजस में
हल्दीघाटी का युद्घ समाप्त हो गया, अकबर अपनी विजय पर भी दुखी था, क्योंकि उसे ज्ञात था कि महाराणा जब तक जीवित हैं, तब तक चित्तौड़ का स्वातंत्र्य समर रूकने वाला नही है। उसे इस युद्घ से यह भी ज्ञात हो गया था कि राणा उदयसिंह का वास्तविक उत्तराधिकारी वह जातिद्रोही और भ्रातृद्रोही जयमाल नही है, जिसे उसने अपने यहां शरण दे रखी है, अपितु राणा उदयसिंह का वास्तविक उत्तराधिकारी तो महाराणा प्रतापसिंह है, जिसे इस देश की जनता 'महाराणा' कहकर तेरा प्रतिद्वंद्वी ही नही अपना हृदय सम्राट भी मान चुकी  है। देश की जनता ने महाराणा को देश का वास्तविक सम्राट मानकर उसे एक छलिया सम्राट (अकबर) के विरूद्घ संघर्ष करने का अपना नैतिक समर्थन दे दिया। अब अकबर और महाराणा प्रतापसिंह के बीच संघर्ष इसी बात का था कि  इस सनातन राष्ट्र भारतवर्ष का वास्तविक सम्राट-अकबर है या महाराणा?

यह दुर्भाग्य का विषय है कि महाराणा प्रतापसिंह इतिहास में  अपने स्थान और सम्मान को प्राप्त करने की लड़ाई आज तक लड़ रहे हैं। 'प्रगतिशील' इतिहासकारों ने देश के साथ छल करते हुए और अकबर का मिथ्या महिमामंडन करते हुए इस रहस्य को और भी गहरा कर दिया है।
हल्दीघाटी के युद्घ के पश्चात महाराणा की चुनौतियां 
अपने भाई शक्तिसिंह से विदा लेकर महाराणा प्रताप कोल्यारी गांव की ओर चले गये थे। हल्दी घाटी का युद्घ (17-18 जून 1576 ई.) दिखने में तो शांत हो गया था परंतु महाराणा के लिए संकट अभी टला नही था। महाराणा के लिए जितना चित्तौडग़ढ़ को लेना महत्वपूर्ण था उतना ही अकबर के लिए महाराणा को लेना महत्वपूर्ण था। अत: संकट कब युद्घ की विभीषिका में परिवर्तित हो जाएगा इस विषय में कुछ नही कहा जा सकता था।
मानसिंह को दरबार से निकाल दिया गया
महाराणा प्रतापसिंह को पाठ पढ़ाने में असफल रहे मानसिंह और आसफ अली से बादशाह अकबर बहुत अप्रसन्न था। ऐसा प्रमाण हमें अलबदायूंनी से ही मिलता है। पर किस बात को लेकर अकबर उनसे अप्रसन्न था इस पर 'तबकाते-अकबरी' का लेखक अहमद बख्शी प्रकाश डालता है-''मानसिंह वापस (अकबर ने उसे गोगूंदा से लौट आने की आज्ञा दी थी क्योंकि मानसिंह चार माह वहां रहने पर भी महाराणा को कैद नही कर पाया था) आने की आज्ञा पाते ही दरबार में उपस्थित हुआ। जब सेना की दुर्दशा (जो राजपूतों ने हल्दीघाटी के युद्घ में कर दी थी) के संबंध में जांच की गयी, तो पाया कि सैनिक बहुत बड़ी आपत्ति में थे, तो भी कुंवर मानसिंह ने राणा  कीका के प्रदेश को लूटने की आज्ञा नही दी। इसी से बादशाह उस पर अप्रसन्न हुआ और कुछ समय के लिए उसे दरबार से निकाल दिया।''
(संदर्भ 'तबकाते-अकबरी इलि' इलियट जि.5 पृष्ठ 400-401)
इसका अभिप्राय है कि अकबर युद्घोपरांत हिंदुओं का नरसंहार चाहता था, जिसे मानसिंह  ने उचित नही माना और युद्घ में या युद्घ के उपरांत हिंदू लोगों को मारने काटने की अनुमति उसने नहीं दी। इससे अकबर की हिंदुओं के प्रति क्रूरता और मानसिंह की उनके प्रति उदारता स्पष्ट होती है। अबुल फजल लिखता है-''दूरदर्शिता के कारण शाही कर्मचारी राणा की खोज में नही गये और रसद पहुंचने की कठिनता के कारण वे शाही प्रदेश से बाहर निकलकर चले आए। खुशामदी लोगों ने बादशाह को यह समझाया कि राणा को नष्ट करने में शाही कर्मचारियों ने शिथिलता की। इस पर बादशाह उन पर क्रुद्घ हुआ परंतु पीछे से उसका क्रोध शांत हो गया।'' (अकबरनामा अंग्रेजी अनुवाद जि. 3 पृष्ठ 256)
 जनता भी महाराणा के साथ  थी
महाराणा प्रताप के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि अकबर के विरूद्घ जारी संघर्ष में उनकी सारी जनता उनके साथ थी। जब मानसिंह की मुगल सेना गोगूंदा में पड़ी हुई थी तो मानसिंह अपने सैनिकों को अकसर रसद आदि के लिए लोगों की बस्तियों में भेजा करता था। इसके लिए 'वीर विनोद'-(भाग 2 पृष्ठ 155) से हमें ज्ञात होता है कि तब हिंदू लोग उन मुगल सैनिकों पर धावा बोल दिया करते थे। ऐसा वह देशभक्ति की भावना से प्रेरित होकर ही किया करते थे, क्योंकि उन्हें अपने देश में विदेशी सेना के सैनिक या हिंदूद्रोही मानसिंह के सैनिकों की उपस्थिति असहनीय थी।
'वीर विनोद' के लेखक का मानना है कि ऐसी नित्य की आपदाओं से शाही सेना भयभीत होकर राजपूतों से लड़ती-भिड़ती बादशाह के पास अजमेर चली गयी और महाराणा बहुत से बादशाही थानों के स्थान पर अपने थाने नियत कर कुंभलगढ़ चला गया। इससे नवीन अनुसंधानकत्र्ता इतिहास लेखकों का मानना है कि बादशाही सेना की महाराणा पर पहली चढ़ाई निष्फल रही थी, जिससे बादशाह अकबर की क्रोधाग्नि का भडक़ना स्वाभाविक ही था।
अकबर स्वयं आ गया गोगूंदा
महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी की लड़ाई के पश्चात गुजरात पर हमला कर दिया था और वह उधर व्यस्त हो गये तो अकबर ने महाराणा के राज्यक्षेत्र पर पुन: अधिकार करने के दृष्टिकोण से एक योजना बनाई। इस बार उसने छल से कार्य लिया और वह शिकार खेलने का नाटक करते हुए मेवाड़ आ गया। यह घटना 13 अक्टूबर 1576 की है। महाराणा अकबर की चाल को समझ गये इसलिए वह अकबर के जाल में न फंसकर पहाड़ों पर चले गये। गोगूंदा से अकबर ने महाराणा की खोज के लिए कुतुबुद्दीन, राजा भगवान दास और कुंवर मानसिंह को भेजा। (संदर्भ : 'अकबरनामा' का बेवरिज कृत अनुवाद पृष्ठ 266-67)
महाराणा प्रताप अकबर द्वारा भेजे गये इन आक्रामकों पर हावी रहे और अंत में इन्हें परास्त होकर अपने बादशाह के पास लौटना पड़ा। अबुल फजल ने स्पष्ट लिखा है :-'वे राणा के प्रदेश में गये, परंतु उसका कुछ पता न लगने से बिना आज्ञा ही लौट आये, जिस पर अकबर ने अप्रसन्न हो उनकी डयोढ़ी बंद करा दी। जो माफी मांगने पर फिर बहाल की गयी।'
(अकबर नामा बेवरिज का अंग्रेजी अनुवाद पृष्ठ 274-75)
बादशाह अकबर मेवाड़ से बांसवाड़ा की ओर चला गया था। जिसका लाभ उठाकर महाराणा प्रताप ने पहाड़ों से उतरकर शाही थानों पर हमला करना आरंभ कर दिया। उन्होंने मेवाड़ से होकर जाने वाले शाही लश्कर का आगरे का रास्ता भी बंद कर दिया।
इसका अभिप्राय है कि महाराणा का संघर्ष निरंतर जारी रहा। वे गुरिल्ला युद्घ को अपना रहे थे। अकबर ने उन्हें गिरफ्तार करने के लिए पुन: कुंवर मानसिंह और बैरम खां के पुत्र मिर्जा खां (अब्दुर्रहीम खानखाना) जैसे कई वरिष्ठ सैन्याधिकारियों को भेजा। पर सबका भेजा जाना निरर्थक रहा।
इस प्रकार अकबर भारत के इस महान स्वाभिमानी, वीर क्रांतिकारी शासक और मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व समर्पण करने के लिए सदा आतुर रहने वाले महाराणा प्रतापसिंह को पकडऩे के जितने भी प्रयास कर रहा था, वे सभी निष्फल सिद्घ हो रहे थे। 
महाराणा के साथ जोड़ी गयीं कुछ मिथ्या धारणाएं
अरावली पर्वत पर रहते महाराणा प्रतापसिंह का इतिहास में अधिक उल्लेख न होने के कारण हम उन्हें ऐसे ही भूखा प्यासा मरता सा व्यक्ति मान लेते हैं, जो इस अवस्था में पूर्णत: असहाय हो गया था और असहायावस्था में एक दिन  इतना निराश भी हो गया कि उसने अकबर के लिए संधि प्रस्ताव ही भेज दिया। जबकि सच इसके विपरीत है। महाराणा एक राजा थे और ऐसे राजा थे जिनकी भूमि का बड़ा भाग तो पराधीन था, परंतु उनके पूर्वजों के राज की सीमाओं के अंतर्गत रहने वाली हिंदू जनता उन्हीं के साथ थी, जो प्राणपण से उनका साथ दे रही थी।
राणा भूखों मरे अथवा घास की रोटी (घास की रोटी बन ही नही सकती) खाते रहे, यह तब तक तो संभव नही था, जब तक कि महाराणा की जनता उनके साथ खड़ी हो। दूसरे, महाराणा का मुगल थानों पर आक्रमण करने का और उन पर अधिकार करते रहने का अर्थ राजनीतिक ही नही, अपितु आर्थिक भी था। वहां से उनकी आर्थिक आवश्यकता पूर्ण होती थी। इसके अतिरिक्त उनके सरदार सामंत और धनी लोग उनके साथ थे जो उनकी रक्षा और आर्थिक सहायता का पूर्ण प्रबंध करते थे। राणा को अरावली पर्वत पर भीलों का भी पूरा सहयोग मिलता रहा। हमें यह नही भूलना चाहिए कि जिस महाराणा को हल्दीघाटी के युद्घ में उनकी प्राणरक्षा के लिए झालाराव मन्नासिंह मिल सकता है, उसे शांतिकाल में उनकी रक्षा के लिए भी 'झालाराव मन्नासिंह' मिलने निश्चित थेे। ऐसी परिस्थितियों में महाराणा को भूखों मरते दिखाकर या अकबर को संधि प्रस्ताव लिखता दिखाकर जहां हम महाराणा का अपमान करते हैं, वहीं उनकी देशभक्त जनता का, उनके देशभक्त सरदारों का, और उनके विश्वसनीय साथियों का भी अपमान करते हैं जो हर क्षण उनके संकेत मात्र से ही अपने प्राण न्यौछावर करने के लिए तैयार रहते थे। मुंशी देवी प्रसाद महाराणा प्रताप के जीवन चरित्र के पृष्ठ 31 पर हमें बताते हैं कि-''महाराणा प्रतापसिंह द्वारा निरंतर  छापामारी से दु:खी होकर उदयपुर और गोगूंदा से शाही थाने उठ गये थे। कहने का अभिप्राय है कि महाराणा का धीरे-धीरे उदयपुर और गोगूंदा पर अपना अधिकार स्थापित हो गया।''
मिर्जा खां की पत्नी को लौटा दिया सम्मान सहित
भारत में नारी का सम्मान प्रत्येक वीर के लिए आवश्यक माना गया है। प्राचीनकाल से ही नारियों को युद्घ के समय तो विशेष सम्मान देने की परंपरा भारत में रही है। हमारे देश में नारी को शत्रु से 'मिला लूट का माल' कभी नही समझा गया। इसके विपरीत उन्हें एक 'शक्ति' के रूप में माना गया है और इसीलिए उन्हें सम्मान भी दिया गया।
महाराणा मर्यादा पुरूषोत्तम राम के वंशज थे। इसलिए वह मर्यादाओं का पालन करना अपना धर्म समझते थे। एक बार महाराणा के सैनिकों को मिर्जा खां की पत्नी युद्घ के समय मिल गयी। सैनिकों का नेतृत्व महाराणा के पुत्र अमरसिंह द्वारा किया जा रहा था। तब महाराणा को इस घटना की जानकारी हुई तो उन्होंने  उस महिला को अपनी पुत्री के समान सम्मान देकर प्रतिष्ठा के साथ उसके पति के पास भेज दिया। मिर्जा खां महाराणा के इस व्यवहार से आजीवन उनके प्रति सदभावी रहा था। ऐसे आदर्श व्यक्तित्व ही इतिहास की शोभा हुआ करते हैं, क्योंकि उनके जीवन आदर्श से आने वाली पीढिय़ां भी शिक्षा लेती हैं। वैसे भी सुयोग्य शासक वही होता है जो अपनी निर्बल जनता और विशेषत: नारी शक्ति का सम्मान करना जानता हो। किसी भी मुस्लिम शासक ने कभी ऐसे जीवनादर्शों को अपनाकर देश की हिंदू जनता के प्रति ऐसी सदाशयता का प्रदर्शन किया?
शाहबाजखां को भेजा गया मेवाड़
जब अकबर ने देखा कि भारत माता का शेर महाराणा किसी भी प्रकार से  नियंत्रण में नही आ पा रहा है तो उसने महाराणा को अपनी दासता स्वीकार करने के लिए बाध्य करने हेतु शाहबाज खां के नेतृत्व में 1578 ई. के अक्टूबर माह में एक विशाल सेना के साथ मेवाड़ भेजा।  महाराणा अकबर के लिए नासूर बन चुके थे और अकबर को सोते-जागते, उठते - बैठते, खाते-पीते सदा महाराणा ही दिखाई देते थे। अब तक महाराणा रूपी शेर को पिंजरे में बंद करने के लिए अकबर ने जितने भी प्रयास किये थे वे सभी असफल सिद्घ हो चुके थे। फलस्वरूप इस बार का प्रयास पहले प्रयासों से अधिक व्यापक स्तर पर किया गया था।
शाहबाज खां के साथ जिन अन्य योद्घाओं को अकबर ने भेजा था उनमें कुंवर मानसिंह, राजा भगवान दास और गजरा चौहान (संदर्भ : मुंशी देवी प्रसाद- 'महाराणा प्रताप का जीवनचरित') जैसे हिंदू भी सम्मिलित थे। मुंशी देवी प्रसाद हमें बताते हैं कि जब शाहबाज खां ने इस सेना को महाराणा से सामना करने के लिए अपर्याप्त बताया तो अकबर ने पीछे से और भी सेना भेज दी।
इस प्रकार मां भारती के वीरपुत्र का इस बार हल्दीघाटी के युद्घ के पश्चात पुन: कठिन परीक्षा से निकलना निश्चित हो गया। शाहबाज खां ने राजा भगवानदास और मानसिंह को बादशाह के पास लौटा दिया, क्योंकि उसे आशंका थी कि वे हिंदू होने के कारण राजपूतों से उतनी वीरता (जिसे क्रूरता कहा जाए तो उचित रहेगा) से नही लड़ेंगे जितनी वीरता की अपेक्षा उनसे लडऩे के लिए की जा सकती है। शाहबाज खां कुंभलगढ़ को अपने नियंत्रण में लेना चाहता था। 'अकबरनामा' (अंग्रेजी अनुवाद) से हमें ज्ञात होता है कि इस अभियान में शाहबाज खां ने केलवाड़ा को महाराणा से छीन लिया।
राजपूतों ने संगठित होकर किया युद्घ का सामना
इसके पश्चात मुगल सेना ने कुंभलगढ़ की ओर प्रस्थान किया। राजपूतों के विषय में 'वीर विनोद' का लेखक हमें बताता है कि उन्होंने संगठित होकर संघर्ष करना आरंभ किया। राजपूतों ने एक दिन रात्रि में मुगल सेना के चार हाथी छीनकर महाराणा को भेंट कर दिये। शाही सेना ने किले की घेराबंदी कर ली। तब महाराणा इस किले की सुरक्षा का भार राव अक्षयराज के पुत्र भाण को सौंप कर स्वयं राणपुर की ओर बढ़ गये।
शाही सेना ने किले में बंद राजपूतों पर प्रबल प्रहार किया। जिसका सामना राजपूतों ने बड़ी वीरता से किया। एक दिन अचानक किले में राजपूतों की युद्घ सामग्री में आग लग गयी, जिससे राजपूतों की भारी क्षति हुई। तब उन्होंने किले के द्वार खोलकर मुगलों से अंतिम युद्घ (15 अक्टूबर 1578 ई. को किया : राणा भाग-8) सोनेगरा और राजपूतों के कितने ही योद्घा इस युद्घ में वीरगति को प्राप्त हो गये। इस प्रकार कुंभलगढ़ के इतिहास में 15 अक्टूबर 1578 का दिन हिंदू वीरता का 'पावन स्मृति दिवस' बन गया। शाहबाज खां का इस दुर्ग पर नियंत्रण स्थापित हो गया और वह इसके पश्चात महाराणा का पीछा करते हुए बांसवाड़ा की ओर आगे बढ़ा। उसने गोगूंदा और उदयपुर पर भी अधिकार कर लिया। पर उस समय तो मां भारती का सबसे सुदृढ़ दुर्ग तो महाराणा प्रतापसिंह नाम का एक सुदृढ़ व्यक्तित्व था। उस सुदृढ़ दुर्ग को अपने नियंत्रण में लेने के लिए ही ये सारे संघर्ष हो रहे थे।
मां भारती ने दिया महाराणा को अपना आशीर्वाद
महाराणा स्वाभिमानी थे, उनका आत्मतेज उन्हें बल प्रदान करता था। उनकी अंतश्चेतना उन्हें सदा मातृभूमि के प्रति समर्पित रहने की शिक्षा देती थी। इसलिए कष्ट चाहे जितने आयें-इसकी उन्हें चिंता नही थी। चिंता थी तो देश के स्वाभिमान की थी, देश की स्वतंत्रता की थी और देश की अस्मिता की थी। अकबर ने उन्हें अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था, इसलिए हर स्थिति में वह महाराणा के स्वाभिमान को तोड़ डालना चाहता था। इस बात को महाराणा भली प्रकार जानते थे। अत:  उन्होंने अपने स्वाभिमान की रक्षार्थ मां भारती से आशीर्वाद प्राप्त किया और मां भारती ने भी अपने इस वीरपुत्र को अपने आशीर्वाद की सारी संपत्ति का ही स्वामी बना दिया। उससे कह दिया कि-'इस समय वत्स तेरे झुकने का अर्थ होगा मेरी अस्मिता पर आक्रमण होना, तेरे पूर्वजों की और इस देश की महान परंपराओं का और सांस्कृतिक मूल्यों का पूर्णत: विनाश हो जाना। अत: झुकना नही है-तेरे साथ तेरे से पूर्व के मेरे असंख्य वीरपुत्रों का (जो वीरगति को प्राप्त हो चुके हैं) आशीर्वाद भी सदा रहेगा। तू उनकी प्रतिष्ठा का ध्यान रखते हुए संघर्ष करता चल।'
महाराणा मां के इस मौन आशीर्वाद में अपने लिए एक चुनौती का, एक ललकार का और एक पुकार का दर्शन करते और अपनी आत्मचेतना के आलोक में निरंतर आगे बढ़ते रहते। पीछे हटकर देखना उन्होंने सीखा नही था, वह केवल आगे देखना जानते थे और आगे खड़े हर तूफान से जूझना उनकी प्रवृत्ति बन गयी थी। वस्तुत: उनकी महानता का सबसे बड़ा कारण ही यह था कि उन्होंने भारत माता के मौन आह्वान को बड़ी उत्कृष्टता से ध्यान पूर्वक सुना, समझा और स्वयं को एक बहुत बड़े प्रश्न का उत्तर बनाकर रणक्षेत्र में समर्पित कर दिया। हम कितने मूर्ख हैं कि हमने अपने इतिहास के इस महानायक के 'उत्तर' के सामने ही प्रश्न चिह्न लगा दिया।
थककर लौट गया शाहबाज खां
शाहबाज खां की इच्छा थी कि जिस काम को उसके पूर्ववर्ती मुगल योद्घा नही कर सके, उसे वह पूर्ण करे और बादशाह अकबर से पुरस्कार प्राप्त कर अपने आपको गौरवान्वित अनुभव करे। कहने का अभिप्राय है कि शाहबाज खां हर स्थिति में महाराणा प्रतापसिंह को कैद कर बादशाह के सामने ले जाकर पटक देना चाहता था। इस उद्देश्य में सफल होने के लिए शाहबाज खां ने महाराणा को पहाड़ों में ढूंढऩा आरंभ कर दिया।
महाराणा के साथ मां भारती का आशीर्वाद था। अत: अरावली की प्राकृतिक और भौगोलिक संरचना ने महाराणा के लिए अपना आंचल खोल दिया और एक पुत्र मां के आंचल में सुरक्षित होकर अपनी योजना पर कार्य करता रहा। शाहबाज खां को भारी परिश्रम के पश्चात भी अपने 'महाराणा खोज अभियान' में सफलता प्राप्त नही हो सकी। उसे इस उद्देश्य में सफल होने के लिए पर्याप्त क्षति भी उठानी पड़ी। अंत में वह निराश होकर जब अपने बादशाह की शरण में पहुंचा और उसे अपनी असफलता की सारी कहानी विस्तारपूर्वक सुनाई तो उसे भी निराश कर दिया। जबकि अकबर को इस बार तो पूर्ण आशा थी कि शाहबाज खां निश्चय ही कोई शुभ सूचना लेकर लौटेगा।
इस प्रकार शाहबाज खां चाहे कुछ दुर्गों को जीतने में सफल हो गया, पर महाराणा के स्वाभिमान के सर्वाधिक सुदृढ़ दुर्ग को विजय करने में तो वह भी असफल रहा। अकबर ने भी उसकी भौतिक दुर्गों की जीत को जीत नही माना, क्योंकि उसके पास दुर्ग तो पहले से ही बहुत सारे थे। 
उसे तो मां भारती के स्वाभिमानी दुर्ग महाराणा प्रतापसिंह के मस्तक पर सज रही पगड़ी रूपी पताका को अपने चरणों में पड़ी हुई देखने की प्रतीक्षा थी। शाहबाज खां से अपनी आशाओं के विपरीत समाचार सुनकर अकबर बेचैन हो उठा। उसे ऐसा लगा कि महाराणा के रहते वह हिंदुस्तान का बादशाह कभी नही हो सकता। इसलिए अकबर अब महाराणा प्रतापसिंह को झुकाने के स्थान पर भारतवर्ष के दूसरे भागों को विजय करने की ओर ध्यान देने लगा। 
क्रमश:
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