भारत उजड़ रहा है और इण्डिया बस रहा है

भारत उजड़ रहा है और इण्डिया बस रहा है

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात की जन्मी पीढ़ी के माता-पिता ज्यों-ज्यों पश्चिमी शिक्षा और उसकी अपसंस्कृति को 'खुलेपनऔर'आधुनिकताके नाम पर अपनाते जा रहे हैंत्यों-त्यों भारत उजड़ रहा है और 'इंडियाबसता जा रहा है। पश्चिम का यह 'खुलापन'और 'आधुनिकता'  हिंदुओं ने ही अधिक अपनायी है। मुस्लिम तो आज भी अधिकतर अपने बच्चों को मजहबी शिक्षा दे रहे हैं। किंतु हिंदू ने अपनी प्राचीन संस्कृति से अप्रत्याशित रूप से मुंह मोड़ लिया है। माता-पिता टी.वी. के पास चिपके रहते हैं और बच्चों को उपदेश देते हैं 'टी.वी. मत देखोजबकि स्वयं अश्लील फिल्में रात भर देखते रहते हैं। वास्तव में यह माता-पिता की मर्यादा नही है,इससे भारत के वर्तमान और भविष्य दोनों पर प्रश्नचिन्ह लगा गया है। हमें स्मरण रखना होगा कि हम जिस 'रामकी पूजा करते हैं उन्होंने सूर्पणखा से विवाह इसलिए नही किया था कि वे पहले से ही विवाहित थे। यद्यपि सूर्पणखा ने स्वयं विवाह प्रस्ताव 'रामके समक्ष ही रखा था। आज भी राम की इसी मर्यादा का पाठ युवा वर्ग को पढ़ाने का समय है।
जनसंख्या आंकड़ों की चेतावनी
जनसांख्यिकीय आंकड़ों पर दृष्टिपात करें। मजहबी आधार पर यदि इन्हें देखें तो मुस्लिम जनसंख्या भारत में अप्रत्याशित रूप में बढ़ी हैजबकि हिंदू व सिखों की जनसंख्या में कमी आयी है। आखिर ऐसा क्योंएक कारण इस कमी का यह भी है कि शिक्षा-प्रसार स्वतंत्रता के पश्चात हिंदुओं में अधिक हुआ है। इस शिक्षा ने पश्चिमी समाज के रोग का रोगाणु भारतीय समाज में फैला दिया है,जिसके कारण प्रथम लक्षण कुछ इस प्रकार दिखाई दे रहे हैं-
-माता-पिता विलासी होते जा रहे हैं।
-बच्चों के प्रति 'हॉस्टल संस्कृतिअपनायी जा रही है।
-'धनके बिना किसी की किसी से 'नमस्तेतक होना अनर्थक है।
-समय का अभावतनावदुरावखिंचाव ये ऐसी समस्याएं हैं जो व्यक्ति को व्यक्ति से काट रही हैं।
-शिक्षित होकर माना जाता है कि जितना चुप और अकेला रहा जाएउतना ही अच्छा है। अत: भारत का लोक-व्यवहार और लोकाचरण समाप्त होता जा रहा है।
माता-पिता आज इन रोगाणुओं से ग्रसित हैं। कल इनसे संतान ग्रसित होगी। तब यहां भी 'वृद्घाश्रमतैयार होंगे। जिनमें बुढ़ापा रेंगेगा और हॉस्टलों में बचपन किलकारी मारेगा। दोनों एक दूसरे से दूर होंगेनीरस फीके और रूखे। तब क्या होगामाताएं मां बनना नही चाहेंगी। पति-पत्नी के साथ और पत्नी पति के साथ रहना नही चाहेगी। परिणाम समाज में भारी उथल-पुथल और अफरा-तफरी के रूप में देखने में आएगा।
आज ऐसा हो भी रहा है जो जितना अधिक 'एडवांसहै या स्वयं को ऐसा मानता है उसी के हृदय को टटोलकर देखें तो ये सारी व्याधियां उसके गले में फांस बनकर अटकी हुई हैं। वह बेहाल हैदुखी हैकिंतु समझ नही पा रहा है कि तेरी इस स्थिति और दुर्दशा का वास्तव में रहस्या क्या हैसमय की पुकार हैऔर भारत माता की मूक हुंकार है कि हम 'मर्यादितआचरण को अपनायें।
भविष्य का निर्माण वर्तमान की मर्यादाओं से बंधा होता है। आज स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात भारत में जो नेतृत्व उभरकर सामने आया उसने कुछ मूर्खतापूर्ण अवधारणाओं को भारतीय समाज पर थोपने का अनुचित प्रयास किया। इनमें से पहली बात तो यह थी कि यह नेहरूछाप नेतृत्व 'धर्मशब्द की वास्तविकता और व्यापकता को नही समझ सका। ऊपरी तौर पर 'धर्मके बाह्य स्वरूप को ही इसने धर्म मान लिया।
उदाहरण के रूप में हिंदुओं द्वारा चोटी रखना और जनेऊ धारण करना धर्म का बाह्य स्वरूप है। जबकि मुसलमानों द्वारा रोजा,जकातनमाजहज और कलमा में आस्था रखना उनके धर्म का बाह्य लक्षण है। इसी प्रकार केशकच्छाकृपाणकंघा और कड़ा धारण करना सिखों का अपने 'धर्मका बाह्य स्वरूप है। वैसे सिख हिंदू धर्म की रक्षार्थ बनाये गये गुरूओं के शिष्य थे। इसलिए यह कोई अलग धर्म नही अपितु हिंदू समाज का ही एक अंग है।
वस्तुत: धर्म का यह बाह्य स्वरूप सम्प्रदायवाद पर बल देता है। समाज को विभिन्न विचारधाराओं की प्रयोगशाला बनाता है। इससे समाज में विभिन्नताओं और विविधताओं का सृजन होता है। यह अकाट्य सत्य है कि जहां विभिन्नता और विविधताओं का बोलबाला हो वहां सामाजिक समरसता का निर्माण संभव नही हो सकता।
मानव धर्म का पालन सरल नही है
सामाजिक समरसता की स्थापना के लिए मानवीय मानस के उन सभी सूक्ष्म तंतुओं की शल्य चिकित्सा करनी होगी जो मानव को मानव नही बनने देते हैं। मानव को मानव बनने से पूर्व इन वर्गों में बांटने वाले तंतु साम्प्रदायिक विषाणुजनित तंतु माने जाकर समूल नष्ट करने होंगे। तब होगा सामाजिक समरसता के निर्माण का स्वप्न साकार और सच्चे मानव का निर्माण भी तभी संभव होगा।'धर्ममनुष्य को इसी अवस्था तक पहुंचाने वाली वस्तु है अर्थात उसे मनुष्यत्व की पूर्ण पराकाष्ठा तक पहुंचाना धर्म का मनुष्य की उन्नति के प्रति वास्तविक ध्येय है।
धर्मनिरपेक्षता का अनर्थ
स्वाधीनता के पश्चात मनुष्य के उसी धर्म की स्थापना भारत में होती तो यहां मनुष्यता (मानव का धर्म) के विकास और विस्तार में सहायता मिलती। किंतु यहां विचार शून्य कांग्रेसी नेतृत्व ने एक शब्दजाल रचा और भारत को धर्मनिरपेक्ष (धर्महीनपथभ्रष्टराष्ट्र घोषित कर दिया। ऐसा राष्ट्र जो न तो अपनी संस्कृति के उत्थान पर बल देगा और न अपने धर्म पर बल देगा। अपितु इन दोनों से इसलिए दूर रहेगा कि इनके विकास और संरक्षण से समाज में साम्प्रदायिकता का विकास होगा। हांअन्य मतपंथसंप्रदाय (यथा मुस्लिमईसाई) को अपने-अपने मतपंथ और संप्रदाय का विस्तार करने की खुली छूट होगी। क्योंकि यह उनका 'निजी मामलाहै।
राष्ट्रघाती चिंतन से सावधान
इस दूषित और राष्ट्रघाती सोच का परिणाम यह निकला कि-
-आज हिंदू बाहुल्य इस देश में हिन्दू ही शोषण का शिकार हो गया है।
-धर्मांतरण का खेल आज भी जारी है।
-हिन्दुओं को कम करके पुन: किसी संप्रदाय का शासन भारत में स्थापित करने का सपना संजोया जा रहा है।
-स्वाधीनता और गणतंत्र दिवस पर हम तिरंगे के नीचे खड़े होकर अपने नेतागण के मुखारबिंदु से उनके संबोधन में प्राय: एक ही वाक्य सुना करते हैं कि-'मजहब नही सिखाता आपस में बैर रखनाइस वाक्य को इतना सुनाया गया है कि हमारे तो सुनते-सुनते कान ही पक गये हैं। हां! इतना अवश्य हुआ है कि कुछ लोग इसको सच भी मान चुके हैं। सच भी है कि एक झूठ को हजार बाल बोला जाए तो वह सच सा ही लगने लगता है। इसलिए जब बार-बार इस झूठी अवधारणा को भारतीय जनसाधारण के सामने रखा गया तो बहुत से लोग इसे सच मानने लगे।
(लेखक की पुस्तक 'वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?' से)
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